उदारीकरण

एलपीजी के कई मायने निकलते हैं। यह लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस भी हो सकता है और लिबरलाइजेशन, प्राइवेटाइजेशन एवं ग्लोबलाइजेशन (उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण) भी, जिसकी अक्सर वाम झुकाव वाले आलोचना करते हैं। इसका एक मतलब सरकार द्वारा आम लोगों की जिंदगी पर डाले गए डाके (लाइफ प्लंडर्ड बाइ गवर्नमेंट) से भी है, जो सरकारी हस्तक्षेप विरोधी भावनाओं से जुड़ा हुआ है। यह एहसास तथाकथित मध्यवर्ग में लगातार बढ़ रहा है। इसकी वजह पेट्रोलियम उत्पादों की बढ़ती कीमतें व इनमें और वृद्धि का प्रस्ताव है।

खुदरा व्यवसाय देश में निजी क्षेत्र का सबसे बड़ा उद्योग है। यह खेती के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा नियोक्ता क्षेत्र भी है। देश की जीडीपी में लगभग 10 प्रतिशत और रोजगार के अवसर प्रदान करने में 6-7 प्रतिशत हिस्सेदारी खुदरा व्यवसाय की है। लगभग डेढ करोड़ रिटेल आऊटलेट्स के साथ भारत विश्व में सबसे ज्यादा आऊटलेट्स घनत्व वाला देश है। चाहे असंगठित रूप से एक परिवार द्वारा छोटे स्तर पर किया जाने वाले खुदरा व्यवसाय के स्वरूप में हो अथवा संगठित रूप में पिछले दस वर्षों में यह क्षेत्र महत्वपूर्ण विकास का साक्षी बना है। उदारवादी अर्थ व्यवस्था, प्रतिव्यक्ति आय और उपभोक्तावाद में वृद्धि ने बड

अप्रैल 2012 से देश में लागू हो चुकी बारहवीं पंचवर्षीय योजना में स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में निजी सरकारी साझेदारी के तहत सुधार की संभावनाएं तलाशने की योजना को कम्प्यूटरीकरण के बाद स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े क्रांतिकारी पहल के तौर पर देखा जाना चाहिए। इससे न केवल शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सुधारात्मक प्रयासों को बल मिलेगा बल्कि देश की मेधा को वांछित स्वरूप भी प्राप्त होगा। देखा जाए तो आजादी के बाद देश ने रक्षा और तकनीकी क्षेत्र में तो काफी विकास किया लेकिन स्वास्थ्य व शिक्षा के मामले यह फिसड्डी ही रहा। रक्षा के क्षेत्र में विकास तो भारी भरकम बजट

जाने माने उद्योगपति व एमफेसिस (बीपीओ) के संस्थापक जयतीर्थ राव ने देश में केंद्रीय योजना आयोग उपयोगिता को सिरे से नकार दिया है। उन्होंने कहा है कि देश में ऐसे किसी भी आयोग की कोई जरूरत नहीं है। इतना ही नहीं जयतीर्थ राव ने योजना आयोग को देश की प्रगति के लिए बाधक बताते हुए कहा कि यदि यह आयोग नहीं होता तो देश आजादी के छह दशकों में वर्तमान की तुलना में कहीं अधिक प्रगति कर चुका होता। राव प्रख्यात अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन की जन्मशती वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित संगोष्टी को संबोधित कर रहे थे। संगोष्टी का आयोजन अंतर्राष्ट्रीय थिंक टैंक संस्था सेंटर फॉर सिविल सोसायटी (सीसीएस) द्

वह जादूगर क्या खूब करामाती था। उसने सवाल उछाला। कोई है जो बीता वक्त लौटा सके?..मजमे में सन्नाटा खिंच गया। जादूगर ने मेज से संप्रग सरकार के पिछले बजट उठाए और पढ़ना शुरू किया। भारी खर्च वाली स्कीमें, अभूतपूर्व घाटे! भीमकाय सब्सिडी बिल! किस्म किस्म के लाइसेंस परमिट राज!

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