teacher

शिक्षक हूँ, पर ये मत सोचो,
बच्चों को सिखाने बैठा हूँ..
मैं डाक बनाने बैठा हूँ ,
मैं कहाँ पढ़ाने बैठा हूँ।
कक्षा में जाने से पहले
भोजन तैयार कराना है...
ईंधन का इंतजाम करना
फिर सब्जी लेने जाना है।
गेहूँ ,चावल, मिर्ची, धनिया
का हिसाब लगाने बैठा हूँ,
मैं कहाँ पढ़ाने बैठा हूँ ...
कितने एस.सी. कितने बी.सी.
कितने जनरल दाखिले हुए,
कितने आधार बने अब तक
कितनों के खाते खुले हुए
बस यहाँ कागजों में उलझा
निज साख बचाने बैठा हूँ

शिक्षा जीवन की ऐसी कड़ी है, जहां से तरक्की और खुशहाली के सारे रास्ते खुलते हैं। सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक आर्थिक उन्नति का आधार भी शिक्षा ही है, लेकिन यही शिक्षा अगर मजाक बनकर रह जाए तो क्या कहिएगा?