Cash transfer

“माल-ए-मुफ्त, दिल–ए-बेरहम, फिर क्या तुम, क्या हम?” हमारी एक आदत सी हो गई है। हम हर चीज की अपेक्षा सरकार या सरकारी व्य वस्था  से करते हैं। यह ठीक है कि हमारे दैनिक जीवन में सरकार का दखल बहुत अधिक है बावजूद इसके हम उस पर कुछ ज्य़ादा ही निर्भर हो जाते हैं। एक कहावत है कि किसी समाज को पंगु बनाना है तो उसे कर्ज या फिर सब्सिडी की आदत डाल दो, वो इससे आगे कभी सोच ही नहीं पाएगा। देश की राजनीति में ये कथन बहुत मौजूं है।  

विशिष्ट पहचान प्राधिकरण के अध्यक्ष नंदन निलेकणि की अध्यक्षता में गठित एक समिति ने अपनी रिपोर्ट में प्रत्यक्ष सब्सिडी व्यवस्था लागू करने का सुझाव दिया है. और केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने प्रत्यक्ष सब्सिडी पर एक रिपोर्ट स्वीकार करते हुए कहा भी है कि रसोई गैस, खाद और मिट्टी के तेल पर प्रत्यक्ष सब्सिडी देकर वर्तमान सब्सिडी व्यवस्था की खामियों से निजात पाया जा सकता है.

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