liberty

उस दौरान बड़ी गहमागहमी थी। देश में युद्ध छिड़ा हुआ था, सभी ने हथियार उठा लिये थे, हर किसी के सीने में देशप्रेम की ज्वाला धधक रही थी; नगाड़े बज रहे थे, बैंड बज रहे थे, खिलौना पिस्तौलें ठांय-ठांय कर रही थीं, पटाखे़ फुसफुसा रहे थे; हर एक हाथ में और छतों और बालकनियों की कतार में कई तरह के झंडे धूप में फड़फड़ा रहे थे; रोज़ाना उस चौड़ी सड़क पर नौजवान स्वयंसेवक अपने नए यूनिफॉर्म पहन कर इतराते हुए परेड करते थे, उनके मां-बाप, बहनें, प्रेमिकाएं गर्व के साथ भावनाओं से तर आवाज़ में उनका हौसला बढ़ाते थे; हर रात भीड़ भरी सभाएं होती थीं, जिनमें देशप्रेम से

इस वर्ष फरवरी में मुझे राष्ट्रपति भवन में आयोजित कुलपतियों के सम्मेलन में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया। इस बहस का उद्‌देश्य भी अच्छा था और इसे बहुत ही अच्छी तरह संचालित किया गया था। देश के शीर्ष केंद्रीय विश्वविद्यालयों के करीब सौ कुलपति सम्मेलन में मौजूद थे। इन्हें कई उप-समूहों में बांटकर देश में शिक्षा क्षेत्र के सामने उपस्थित ज्वलंत विषयों पर विचार-विमर्श किया गया। हालांकि, सम्मेलन का स्वरूप थोड़ा औपचारिक था, लेकिन जिन विचारों पर चर्चा हुई वे सारे ज्वलंत व प्रासंगिक थे।