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किसी व्यक्ति के सशक्त होने का व्यवहारिक मानदंड क्या है? इस सवाल के जवाब में व्यवहारिकता के सर्वाधिक करीब उत्तर नजर आता है- आर्थिक सक्षमता। व्यक्ति आर्थिक तौर पर जितना सम्पन्न होता है, समाज के बीच उतने ही सशक्त रूप में आत्मविश्वास के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। निश्चित तौर पर आर्थिक मजबूती के लिए अर्थ को अर्जित करना ही पड़ता है। भारतीय अर्थ परम्परा में धर्म और अर्थ को परस्पर पूरक तत्व के रूप में प्रस्तुत करते हुए महर्षि चाणक्य ने भी कहा है- धर्मस्य मूलम अर्थम्। यानी, धर्म के मूल में अर्थ अनिवार्य तत्व है।

Author: 
शिवानंद दिवेदी

प्रधानमंत्री मोदी जी द्वारा 500 और 1000 के नोट समाप्त करने के फैसले से पहले मैं भी अचंभित हुआ और आनंदित भी। पर कुछ समय तक गहराई से सोचने के बाद सारा उत्साह समाप्त हो गया। नोट समाप्त करने और फिर बाजार में नए बड़े नोट लाने से अधिकतम 3% काला धन ही बाहर आ पायेगा, और मोदी जी का दोनों कामों का निर्णय कोई दूरगामी परिणाम नहीं ला पायेगा, केवल एक और चुनावी जुमला बन कर रह जाएगा। नोटों को इसप्रकार समाप्त करना- 'खोदा पहाड़ ,निकली चुहिया " सिद्ध होगा। समझने की कोशिश करते हैं।

दिल्ली में भाजपा की हार के बाद मोदी सरकार राजनीतिक साहस की कमी से जूझ रही है। इसलिए सरकार में यह साहस नहीं रहा कि वह मनरेगा जैसी नाकाम रोजगार योजनाओं को बंद कर सके। भाजपा को डर है कि अगर उसने इस तरह की योजनाओं को बंद किया तो उन्हें गरीब विरोधी करार दे दिया जाएगा।

चार राज्यों के विधानसभा चुनाव नतीजे एक नई-बिलकुल नई इबारत लिख रहे हैं। इसलिए नहीं कि कांग्रेस दिल्ली, राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में से कहीं भी सरकार बनाने में कामयाब नहीं हो सकी, बल्कि इसलिए कि देश की राजधानी में आम आदमी पार्टी के उभार ने देश को एक नया संदेश दिया है। बमुश्किल एक साल पुराने दल-आप-की दिल्ली में अप्रत्याशित और उल्लेखनीय जीत पर शेष देश में जैसी प्रतिक्रिया हो रही है उससे यह तो साफ है कि आम जनता ने इस संदेश को ग्रहण कर लिया है, लेकिन यह कहना कठिन है कि राजनीतिक दल भी यह सही तरह समझ गए हैं कि उनके लिए अपने तौर-तरीकों में बद

काले धन का जवाब है वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी)। भाजपा शासित प्रदेश जीएसटी का रास्ता रोक कर काले धन पर अंकुश न लगाने के सबसे बड़े दोषी हैं। इस तरह वे काले धन की महामारी को फैलने में सहयोग प्रदान कर रहे है। देश भर में बाबा रामदेव के प्रति जबरदस्त श्रद्धा है। उन्होंने योग के प्रति जागरूकता पैदा कर करोड़ों लोगों को स्वस्थ जीवन की ओर प्रेरित किया, किंतु एक क्षेत्र विशेष में ठोस उपलब्धियों का यह मतलब नहीं कि वह काले धन के विशेषज्ञ हो गए है। उनकी मंशा तो अच्छी है, किंतु वह काले धन के अर्थशास्त्र को नहीं समझते। न तो रामदेव और न ही भाजपा यह समझती है कि भारतीयों द्वारा विदेशी बैंकों में जमा किए गए काले धन से कहीं बड़ी मात्रा में काला धन भारत में मौजूद है। इसलिए देश की पहली प्राथमिकता देश के अंदर काले धन पर रोक लगाने की होनी चाहिए और इसका सर्वश्रेष्ठ उपाय है जीएसटी लागू करना। जीएसटी व्यापारियों और नागरिकों के नकद व्यवहार पर रोक लगाता है, क्योंकि इसमें कर के भुगतान पर प्रोत्साहन है।

Author: 
गुरचरण दास