राइट टू एजुकेशन

भारत में फीस लेने वाले प्राइवेट स्कूलों को स्नेह और नापसंदगी दोनों समान रूप से प्राप्त है। बच्चों की शिक्षा के लिए एक तरफ तो ये स्कूल अभिभावकों के लिए काफी मूल्यवान हैं, वहीं दूसरी तरफ इन्हें या तो 'बच्चों के जीवन के साथ खेलने वाली शिक्षा की दुकानों (टीचिंग शॉप्स)' अथवा ऊंची फीस वसूलने वाले मुनाफाखोर संस्थाओं के तौर पर नापसंद भी किया जाता है। प्राइवेट स्कूलों की नैतिकता का प्रश्नचिन्ह होने के बावजूद देश में सभी प्रकार की प्राइवेट शिक्षा जैसे कि झुग्गी झोपड़ियों में चलने वाले प्राइवेट स्कूलों से लेकर कुलीन प्राइवेट स्कूलों के विस्तार के साथ एक

शिक्षा निदेशालय ने 22 मार्च 2013 को एक परिपत्र (सर्क्युलर) जारी कर अनधिकृत कॉलोनियों में संचालित होने वाले प्राइमरी स्कूलों व मिडिल स्कूलों के लिए भूमि की न्यूनतम सीमा की अनिवार्यता में ढील दी थी। वर्तमान में यह सीमा प्राइमरी स्कूलों के लिए 200 स्क्वायर यार्ड और मिडिल स्कूलों के लिए 700 स्क्वायर मीटर (857 स्क्वायर यार्ड) है।

अध्यापकों की शैक्षणिक योग्यता और वेतन

शिक्षा का अधिकार (आरटीई) कानून 2009 में शिक्षक होने के लिए बैचलर ऑफ एजुकेशन (बीएड) की योग्यता को अनिवार्य बना दिया गया है। इसके अतिरिक्त, पहले से ही अध्यापनरत समस्त अध्यापकों के लिए अध्यापक पात्रता परीक्षा (टीईटी) उतीर्ण करना भी अनिवार्य कर दिया गया है। राज्य सरकारों ने भी उक्त नियमों में रियायत नहीं दी और सभी निजी स्कूलों के अध्यापकों के लिए पांच वर्ष के भीतर टीईटी उतीर्ण करना आवश्यक कर दिया।

प्राइवेट स्कूल प्रत्येक वर्ष फीस में कुछ न कुछ बढ़ोतरी अवश्य करते हैं। बच्चों को मिलने वाली गुणवत्ता युक्त शिक्षा के ऐवज में आमतौर पर अभिभावकों यह स्वीकार्य भी होता है। हालांकि, हाल फिलहाल में अलग अलग मदों में होने वाली फीस वृद्धि को अनापेक्षित व अनावश्यक बताते हुए अभिभावकों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया है। वे अब सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन करने लगे हैं।

आज अगर किसी से भी भारतीय शिक्षा व्यवस्था की बात की जाय तो सब यही कहेंगे कि शिक्षा एक व्यवसाय बन गया है, एक बाजार बन गया है। लेकिन क्या सच में ऐसा है अगर इस बात में सच्चाई होती तो क्या भारतीय शिक्षा व्यवस्था की इतनी दुर्दशा होती? इतनी खामियां और नाकामियां होती?

- शिक्षा का अधिकार कानून ही बन रहा शिक्षा की राह का सबसे बड़ा रोड़ा
- आरटीई के दोषपूर्ण उपनियमों के कारण 1 लाख से अधिक स्कूलों पर तालाबंदी का खतरा, 2 करोड़ से  ज्यादा छात्रों का भविष्य दाव पर

शिक्षा का अधिकार क़ानून-२००९ लागू होने के बाद यह उम्मीद जताई गयी कि यह क़ानून प्राथमिक स्तर पर देश के गरीब से गरीब बच्चे की शिक्षा को सुनिश्चित करेगा। लेकिन अपने पेंचीदा प्रावधानों की वजह से आज यह क़ानून ही सवालों के घेरे में खड़ा हो गया है। इससे पहले की हम शिक्षा के अधिकार क़ानून की खामियों पर बात करें, हमे इस बात पर गौर करना होगा कि कोई भी क़ानून लाने का उद्देश्य क्या होता है?

रायपुर. शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) की मदद से ज्यादातर बच्चों को सरकारी स्कूलों में लाने की योजना फेल साबित हुई है। स्कूल शिक्षा विभाग ने पिछले साल दाखिले की प्रक्रिया बदली थी। इसके तहत पहले सरकारी स्कूलों में फिर अनुदान प्राप्त व आखिर में प्राइवेट स्कूलों में दाखिला दिया जाना था।

सेंटर फॉर सिविल सोसायटी  (सीसीएस) और सेंट्रल स्क्वायर फाउंडेशन (सीएसएफ) द्वारा फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (फिक्की) के संयुक्त तत्वावधान में फेडरेशन हाउस में 29 अगस्त 2013 को राइट टू एजुकेशन पोर्टल की लॉंचिंग की जा रही है। उद्घाटन समारोह के दौरान सांसद श्री नवीन जिंदल और श्री प्रकाश जावडेकर बतौर मुख्य अतिथि मौजूद रहेंगे।

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