शिक्षा

बहुत पुरानी बात है। गंगा तट पर बसी काशी नगरी को तब भी व्यापार, कला और कारीगरी के क्षेत्र में उत्कृष्ट मुकाम हासिल था। नगर से थोड़ी दूरी पर जुलाहों का एक दल निवास करता था। जुलाहों का मुख्य पेशा बांस की टोकरी आदि बनाना था। आमतौर पर उनके मकान कच्चे थे और बांस, मिट्टी और खपरैल आदि के ही बने थे। उनमें से सिर्फ दो-एक मकान ऐसे थे जो पक्के थे। इन पक्के मकानों में से एक मकान वृद्ध रामदीन का था। दरअसल, रामदीन अन्य जुलाहों की तरह बांस की टोकरी इत्यादि बनाने के स्थान पर रेशम के वस्त्र बनाया करता था। उसके बनाए हुए वस्त्रों की एक अलग खासियत थी। वस्त्र सदैव

शिक्षा का अधिकार क़ानून-२००९ लागू होने के बाद यह उम्मीद जताई गयी कि यह क़ानून प्राथमिक स्तर पर देश के गरीब से गरीब बच्चे की शिक्षा को सुनिश्चित करेगा। लेकिन अपने पेंचीदा प्रावधानों की वजह से आज यह क़ानून ही सवालों के घेरे में खड़ा हो गया है। इससे पहले की हम शिक्षा के अधिकार क़ानून की खामियों पर बात करें, हमे इस बात पर गौर करना होगा कि कोई भी क़ानून लाने का उद्देश्य क्या होता है?

लोकसभा टीवी द्वारा नई शिक्षा नीति के संदर्भ में सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों के बाबत ‘शिक्षा का सवेरा’ नामक शीर्षक के तहत एक विशेष कार्यक्रम तैयार किया गया। यह कार्यक्रम 6 सितंबर 2015 को प्रसारित किया गया। कार्यक्रम में भारत की वर्तमान शिक्षा प्रणाली की चुनौतियों को प्रमुखता से उद्घाटित किया गया। कार्यक्रम में नई शिक्षा नीति के बाबत कुछ सुझावों पर भी प्रकाश डाला गया जिन पर केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा कार्य किया जा रहा है। कार्यक्रम में सेंटर फॉर सिविल सोसायटी द्वारा समय समय पर उठाए जाने वाले बिंदुओं को भी सम्मिलित किया गया है।

- प्राइवेट अनएडेड स्कूलों ने सरकार पर लगाए सरकारी और निजी स्कूलों में भेदभाव करने का आरोप
- आरटीई की खामियों के कारण बंदी की मार झेल रहे देशभर के स्कूलों ने जंतर मंतर पर किया प्रदर्शन
- प्रधानमंत्री मोदी से पांच लाख अध्यापकों के रोजगार व 3 करोड़ छात्रों के भविष्य को बचाने की गुहार

निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से लागू किया गया शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) ही विद्यार्थियों की शिक्षा के राह का रोड़ा बन रहा है। आरोप है कि आरटीई के कुछ दोषपूर्ण उपनियमों के कारण देशभर के करीब एक लाख से अधिक छोटे स्कूल बंदी के कगार पर जा पहुंचे हैं। ऐसे स्कूलों की संख्या करीब 300 है, जो जमीन की अनिवार्यता के चलते 31 मार्च के बाद बंद हो जाएंगे। ऐसे में परेशान स्कूलप्रबंधक 24 फरवरी को जंतर-मंतर पर एकत्र होंगे। इस दौरान वे प्रधानमंत्री से स्कूलों की मान्यता के मामले में गुजरात मॉडल को देशभर मे लागू करने की मांग क

रायपुर. शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) की मदद से ज्यादातर बच्चों को सरकारी स्कूलों में लाने की योजना फेल साबित हुई है। स्कूल शिक्षा विभाग ने पिछले साल दाखिले की प्रक्रिया बदली थी। इसके तहत पहले सरकारी स्कूलों में फिर अनुदान प्राप्त व आखिर में प्राइवेट स्कूलों में दाखिला दिया जाना था।

बजट प्राइवेट स्कूलों की अखिल भारतीय संस्था नीसा (नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल्स अलाएंस) माननीय दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा गैर सहायता प्राप्त निजी स्कूलों में नर्सरी दाखिले के दौरान मैनेजमेंट कोटा की बहाली के आदेश का स्वागत करती है। ऐसा लगातार दूसरी बार है जब हाईकोर्ट ने दिल्ली के गैर सहायता प्राप्त निजी स्कूलों की स्वायतता पर मुहर लगाई है। दिल्ली सरकार को चाहिए कि अदालत के आदेशानुसार वह निजी स्कूलों को संविधान के अनुच्छेद 19(1)g के तहत प्राप्त मौलिक अधिकारों का सम्मान करे। सरकार से अनुरोध है कि वह निजी स्कूलों के प्रबंधन में हस्तक्षेप करने की बजाए सरकारी स्कूलों में शिक्षण प्रशिक्

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