शिक्षा

- पॉलिसी रिव्यू कमेटी का गठन कर बजट प्राइवेट स्कूलों के समक्ष उत्पन्न होने वाली कई समस्याओं का करेंगे समाधान
- दिल्ली के निजी स्कूलों ने अव्यवहारिक ‘लैंड नॉर्म्स’ के कारण पैदा हुई समस्याओं से उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को कराया था अवगत

एक अप्रैल 2010 को ‘शिक्षा का अधिकार’ क़ानून 86वें संशोधन के तहत लागू किया गया था। इस क़ानून को लागू करने के पीछे मुख्य उद्देश्य यही था कि छह वर्ष से चौदह वर्ष तक के बच्चों की मुफ्त शिक्षा को सुनिश्चित किया जाये। इस क़ानून से शिक्षा प्राप्त करना न सिर्फ हर बच्चे का अधिकार बना बल्कि सरकार की भी जवाबदेही तय हो गयी।

शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के उद्देश्य से हाल ही में दिल्ली सरकार द्वारा ‘चुनौती 2018’ कार्यक्रम की घोषणा की गई। इस कार्यक्रम के तहत छठी से नौवीं कक्षा के छात्रों के सीखने की क्षमता का मूल्यांकन (लर्निंग असेसमेंट) कराने का कार्य किया गया। मूल्यांकन का परिणाम ठीक वैसा ही रहा जैसा कि अपेक्षित था। छठीं कक्षा के 74 फीसदी छात्र धारा प्रवाह हिंदी की किताब पढ़ने में और साधारण वाक्य लिखने भी असमर्थ पाए गये। हालांकि यह परिणाम कहीं से भी चौंकाने वाला नहीं साबित हुआ। अर्थात यह वह परिणाम था जिससे ज्यादा की अपेक्षा आमतौर पर सरकारी स्कूलों की शिक्षा की ग

पिछले एक दशक में देश में शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के तेज प्रयास देखने को मिले हैं। 6 से 14 वर्ष के बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा की गारंटी प्रदान करने वाला 'शिक्षा का अधिकार अधिनियम-2009' (आरटीई एक्ट) सुधार के प्रयासों की एक अत्यंत महत्वपूर्ण कड़ी है। वर्तमान केंद्र सरकार द्वारा नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) बनाने की कवायद भी सुधार का अगला चरण हैं। हालांकि इससे पहले सन् 1968 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और बाद में सन् 1986 में राजीव गांधी सरकार द्वार नई शिक्षा नीतियां लागू की गईं। वर्ष 1992 में इसमें कुछ छोटे-छोटे बदलाव भी

आज अगर किसी से भी भारतीय शिक्षा व्यवस्था की बात की जाय तो सब यही कहेंगे कि शिक्षा एक व्यवसाय बन गया है, एक बाजार बन गया है। लेकिन क्या सच में ऐसा है अगर इस बात में सच्चाई होती तो क्या भारतीय शिक्षा व्यवस्था की इतनी दुर्दशा होती? इतनी खामियां और नाकामियां होती?

- नौनिहालों के उज्जवल भविष्य के लिए ऑनलाइन प्लेटफॉर्म विकी पर शिक्षाविद, अध्यापक, अभिवावक, सिविल सोसायटी, स्कूल संचालक करा रहे हैं राय दर्ज
- शिक्षा क्षेत्र से जुड़े सभी प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष सेक्टर्स की मांग को आवाज देने एक मंच पर आए सिविल सोसायटी संगठन

भारत में शिक्षा के लिए संसाधन जुटाने की तमाम कोशिशें हो रही हैं। शिक्षा उपकर से लेकर न जाने क्या-क्या? पर हकीकत ये है कि सरकार जो पैसे खर्च करती हैं, उसका भारी दुरुपयोग होता है। क्यों न शिक्षा के लिए आवंटित पैसे सीधे-सीधे छात्रों को वाउचर के रूप में दे दिया जाए - पेश है इस पर एक पड़ताल।

सहभागितापूर्ण लोकतंत्र के मूलमंत्र को आत्मसात करते हुए थिंकटैंक सेंटर फॉर सिविल सोसायटी (सीसीएस) ने शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय विभिन्न संगठनों को एक मंच के नीचे लाकर 'एनईपी गठबंधन' तैयार किया है। गठबंधन का उद्देश्य नई शिक्षा नीति के बाबत व्यापक विचार विमर्श करना है। इस उद्देश्य को अमली जामा पहनाते हुए एनईपी गठबंधन द्वारा ऑनलाइन विचारमंच (विकी) www.nep.ccs.in लांच किया गया है। इस विचारमंच पर कोई भी आम-ओ-खास शिक्षा और शिक्षा के बाबत बनने वाली नीतियों पर अपने विचार प्रकट कर सकता है। इस विचारमंच को तैयार करते

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