शिक्षा

भारतीय संविधान के नीति निर्देशक सिंद्धांतों में 6 से 14 साल के सभी बच्चों के निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान है। किंतु अर्थाभाव और राजनीततिक उदासीनता के चलते इन सिद्धांतों पर अमल नहीं हो पाया। माननीय अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने मामले को गंभीरता से लिया पर अंततः 2009 में माननीय डा. मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार ने निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा अधिनियम को लागू किया और 2010 में इसकी अधिसूचना जारी कर दी गई। हालांकि आरटीई एक्ट में कई त्रुटियां थीं और इस कानून का मकसद पूरा नहीं हो पाया।

आज देश में शिक्षा की दुर्दशा को लेकर दबी जुबान में बोलने का कोई फायदा नहीं है। दरअसल हालात बहुत बिगड़ गए हैं। दो टूक में कहें तो इसके लिए जिम्मेदार हैं स्कूल और शिक्षक जिनमें जिम्मेदारी का सर्वथा अभाव रहा है। ऐसे में शिक्षा व्यवस्था पर छिटपुट प्रहार करने से काम नहीं बनेगा। लेकिन भारत में शिक्षा माफिया और इनकी लॉबी इतनी मजबूत है कि इसे आड़े हाथों लेना बहुत कठिन है और नई शिक्षा नीति (एनईपी) के कर्णधार यह बखूबी जानते हैं और इससे इनकार भी नहीं कर सकते। ऐसे में शिक्षा क्षेत्र में जिम्मेदारी को लेकर जो आमूल परिवर्तन जरूरी हैउसके विरोध में मौजूदा श

किसी मेहमान के लिए मेज़बान के मूंह पर इतनी बड़ी बात और वह भी बेबाकी से कहने की घटना बिरले ही सुनने में आती है जैसा कि भारत के मेहमान सिंगापुर के डिप्युटी प्राइम मिनिस्टर थर्मन शन्मुगरत्नम ने हमारे देश में भरी सभा में कह दी। दिल्ली के विज्ञान भवन में बोलते हुए उन्होंने कहा कि ‘‘भारत में स्कूलों की भारी कमी है" और "यह वह कमी है जिसे उचित नहीं ठहराया जा सकता है।" बेशक, मेहमान ने कोई नई बात नहीं कही पर जिस संदर्भ में यह बात कही गई वह गौरतलब है। उनका कहना है, ‘‘भारत और ईस्ट एशिया के देशों में सबसे बड़ा अंतर’ ख़ास्ताहाल शिक्षा का है। भारत की मौजूदा शिक

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एक अप्रैल 2010 को ‘शिक्षा का अधिकार’ क़ानून 86वें संशोधन के तहत लागू किया गया था। इस क़ानून को लागू करने के पीछे मुख्य उद्देश्य यही था कि छह वर्ष से चौदह वर्ष तक के बच्चों की मुफ्त शिक्षा को सुनिश्चित किया जाये। इस क़ानून से शिक्षा प्राप्त करना न सिर्फ हर बच्चे का अधिकार बना बल्कि सरकार की भी जवाबदेही तय हो गयी।

शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के उद्देश्य से हाल ही में दिल्ली सरकार द्वारा ‘चुनौती 2018’ कार्यक्रम की घोषणा की गई। इस कार्यक्रम के तहत छठी से नौवीं कक्षा के छात्रों के सीखने की क्षमता का मूल्यांकन (लर्निंग असेसमेंट) कराने का कार्य किया गया। मूल्यांकन का परिणाम ठीक वैसा ही रहा जैसा कि अपेक्षित था। छठीं कक्षा के 74 फीसदी छात्र धारा प्रवाह हिंदी की किताब पढ़ने में और साधारण वाक्य लिखने भी असमर्थ पाए गये। हालांकि यह परिणाम कहीं से भी चौंकाने वाला नहीं साबित हुआ। अर्थात यह वह परिणाम था जिससे ज्यादा की अपेक्षा आमतौर पर सरकारी स्कूलों की शिक्षा की ग

पिछले एक दशक में देश में शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के तेज प्रयास देखने को मिले हैं। 6 से 14 वर्ष के बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा की गारंटी प्रदान करने वाला 'शिक्षा का अधिकार अधिनियम-2009' (आरटीई एक्ट) सुधार के प्रयासों की एक अत्यंत महत्वपूर्ण कड़ी है। वर्तमान केंद्र सरकार द्वारा नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) बनाने की कवायद भी सुधार का अगला चरण हैं। हालांकि इससे पहले सन् 1968 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और बाद में सन् 1986 में राजीव गांधी सरकार द्वार नई शिक्षा नीतियां लागू की गईं। वर्ष 1992 में इसमें कुछ छोटे-छोटे बदलाव भी

आज अगर किसी से भी भारतीय शिक्षा व्यवस्था की बात की जाय तो सब यही कहेंगे कि शिक्षा एक व्यवसाय बन गया है, एक बाजार बन गया है। लेकिन क्या सच में ऐसा है अगर इस बात में सच्चाई होती तो क्या भारतीय शिक्षा व्यवस्था की इतनी दुर्दशा होती? इतनी खामियां और नाकामियां होती?

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