शिक्षा

निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से निर्मित शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई एक्ट 2009) आने और वर्ष 2010 से लागू होने के 7 वर्ष पूरे हो चुके हैं। लेकिन इतनी बड़ी समयावधि बीत जाने के बाद भी तमाम समस्याएं अब भी बरकरार हैं। एक तरफ स्कूल आरटीई के प्रावधानों को अव्यवहारिक बताकर इसकी मुखालफत कर रहे हैं वहीं सरकार हर हाल में उन प्रावधानों को लागू कराना चाहती है। तय समय सीमा के भीतर प्रावधानों के लागू न किए जाने की दशा में स्कूलों पर तगड़े जुर्माने और उन्हें बंद करने का नियम है। गैर आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक आरटीई कानून आने के बाद स

इसमें कोई शक नहीं कि किसी भी क्षेत्र में, चाहें वो सेवा का क्षेत्र हो अथवा उत्पादन का, जबतक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा वाली स्थिति नहीं होती है तबतक गुणवत्ता और पारदर्शिता दोनों का अभाव बना रहता है। प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ गुणवत्ता और पारदर्शिता के लिए मूल्यांकन का होना नितांत आवश्यक है। आज जब प्रश्न शिक्षा में गुणवत्ता का उठता है तो बहस को सरकारी बनाम निजी स्कूल की तरफ मोड़ देने का चलन है। यह मुद्दे से ध्यान भटकाने वाली स्थिति भर है। सवाल यह कभी नहीं होना चाहिए कि शिक्षा सरकारी हो या प्राइवेट?

हमारे आस पास तमाम ऐसी घटनाएं घटित होती हैं जो अखबारों की सुर्खियां नहीं बन पाती लेकिन अक्सर समाज में बदलाव लाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। परिवर्तन की ऐसी ही एक सकारात्मक बयार  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी के अमरा गांव में भी बहती महसूस की जा सकती है। इसकी शुरूआत एक स्वयं सहायता समूह की प्रेरणा से स्थानीय स्कूल में पढ़ने वाले 10-12 वर्ष के कुछ छात्र-छात्राओं द्वारा स्कूल न जाने वाले बच्चों को पढ़ाने के काम से शुरू हुई। स्कूली बच्चे गांव के खेत-खलिहान के आस पास के अन्य बच्चों को बैठाकर पढ़ाना शुरू किया। इन

बीते दिनों केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने 10वीं कक्षा में बोर्ड की परीक्षा को पुनः अनिवार्य बनाने पर अपनी सहमति दे दी। इसके साथ ही राज्यों को पांचवी कक्षा के बाद परीक्षा कराने की भी दे दी गई। राजस्थान सहित कई राज्यों ने छठीं व आगे की कक्षा में परीक्षा कराने की गैर आधिकारिक घोषणा भी कर दी। 10वीं में बोर्ड की परीक्षा व छठीं तथा आगे की कक्षा में वार्षिक परीक्षा पद्धति वापस लाने के पीछे छात्रों द्वारा लापरवाही करने और पढ़ाई पर ध्यान न देने को प्रमुख वजह बताया गया है। इसे तर्कसंगत साबित करने के लिए राज्यों द्वारा तमाम सरकारी,

शिक्षा का अधिकार कानून (RTE) के एक अहम प्रावधान 'नो डिटेंशन पॉलिसी' को जारी रखने, समाप्त करने या फिर 5वीं कक्षा तक सीमित करने, 10वीं में बोर्ड परीक्षा को दुबारा कम्पलसरी किए जाने, लर्निंग आऊटकम निर्धारित करने जैसे मुद्दे पर केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री सहित तमाम राज्यों के शिक्षा मंत्रियों के साथ सेंट्रल एडवाइज़री बोर्ट ऑफ एजुकेशन (CABE) ने 25 अक्टूबर 2016 को एक बैठक की। बैठक में नो डिटेंशन अर्थात 8वीं कक्षा तक फेल न करने की नीति में बदलाव पर सहमति बनी। इसके अलावा 10वीं में बोर्ड की परीक्षा को फिर से कम्पलसरी करने का भी निर्णय लिया गया। इसी मुद्दे पर 'सीएनबीसी आवाज' चैनल न

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भारतीय संविधान के नीति निर्देशक सिंद्धांतों में 6 से 14 साल के सभी बच्चों के निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान है। किंतु अर्थाभाव और राजनीततिक उदासीनता के चलते इन सिद्धांतों पर अमल नहीं हो पाया। माननीय अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने मामले को गंभीरता से लिया पर अंततः 2009 में माननीय डा. मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार ने निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा अधिनियम को लागू किया और 2010 में इसकी अधिसूचना जारी कर दी गई। हालांकि आरटीई एक्ट में कई त्रुटियां थीं और इस कानून का मकसद पूरा नहीं हो पाया।

आज देश में शिक्षा की दुर्दशा को लेकर दबी जुबान में बोलने का कोई फायदा नहीं है। दरअसल हालात बहुत बिगड़ गए हैं। दो टूक में कहें तो इसके लिए जिम्मेदार हैं स्कूल और शिक्षक जिनमें जिम्मेदारी का सर्वथा अभाव रहा है। ऐसे में शिक्षा व्यवस्था पर छिटपुट प्रहार करने से काम नहीं बनेगा। लेकिन भारत में शिक्षा माफिया और इनकी लॉबी इतनी मजबूत है कि इसे आड़े हाथों लेना बहुत कठिन है और नई शिक्षा नीति (एनईपी) के कर्णधार यह बखूबी जानते हैं और इससे इनकार भी नहीं कर सकते। ऐसे में शिक्षा क्षेत्र में जिम्मेदारी को लेकर जो आमूल परिवर्तन जरूरी हैउसके विरोध में मौजूदा श

किसी मेहमान के लिए मेज़बान के मूंह पर इतनी बड़ी बात और वह भी बेबाकी से कहने की घटना बिरले ही सुनने में आती है जैसा कि भारत के मेहमान सिंगापुर के डिप्युटी प्राइम मिनिस्टर थर्मन शन्मुगरत्नम ने हमारे देश में भरी सभा में कह दी। दिल्ली के विज्ञान भवन में बोलते हुए उन्होंने कहा कि ‘‘भारत में स्कूलों की भारी कमी है" और "यह वह कमी है जिसे उचित नहीं ठहराया जा सकता है।" बेशक, मेहमान ने कोई नई बात नहीं कही पर जिस संदर्भ में यह बात कही गई वह गौरतलब है। उनका कहना है, ‘‘भारत और ईस्ट एशिया के देशों में सबसे बड़ा अंतर’ ख़ास्ताहाल शिक्षा का है। भारत की मौजूदा शिक

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