शिक्षा

आठवीं कक्षा तक छात्रों को फेल न करने की नीति को सैद्धांतिक मंजूरी पर विवाद शुरू हो गए हैं। जिन कारणों के चलते आठवीं तक छात्रों को फेल ना करने की नीति 1986 की नई शिक्षा नीति में स्वीकार की गई थी, उसमें सबसे प्रमुख कारण था स्कूलों से असमय ही बच्चों का पढ़ाई छोड़ देना। निश्चित तौर पर आठवीं तक छात्रों को फेल न करने की नीति से स्कूली शिक्षा बीच में ही छोड़ देने की प्रवृत्ति पर रोक लगी। लेकिन अब इस नीति को सिर्फ पांचवीं कक्षा तक ही सीमित करने के प्रावधान के बाद एक बार फिर यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि भारत जैसे देश में, जहां शिक्षा को मौलिक अधिकार में

संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों में शिक्षा के अधिकार को शामिल किए जाने के बाद एक बार वह पुराना सवाल फिर उठने लगा है। सवाल यह कि देश के सभी बच्चों को एक समान शिक्षा का अधिकार मिलना ही चाहिए। 1935 में जब भारत सरकार अधिनियम के तहत गठित राज्यों की सरकारों को जिन आठ विषयों पर शासन करने का अधिकार तत्कालीन अंग्रेज सरकार ने दिया था, उनमें से एक अधिकार शिक्षा व्यवस्था का भी संचालन था। गांधीजी को तब आने वाली चुनौतियों का पता था, इसीलिए उन्होंने डॉक्टर जाकिर हुसैन की अध्यक्षता में राज्यों की शिक्षा व्यवस्था कैसी हो, इस पर विचार करने की जिम्मेदारी दी थी।

स्कूलों से संबंधित नीतियों के निर्धारण की प्रक्रिया के दौरान अनऐडेड बजट स्कूलों के प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने की मांग को लेकर बजट स्कूल एसोसिएशनों के अखिल भारतीय संगठन 'नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल्स अलायंस' (निसा) का एक प्रतिनिधिमंडल बृहस्पतिवार को केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय पहुंचा। निसा प्रेसिडेंट कुलभूषण शर्मा के नेतृत्व में मानव संसाधन मंत्रालय पहुंचे बजट स्कूल एसोसिएशनों के विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधियों ने सेक्रेटरी, डिपार्टमेंट ऑफ स्कूल एजुकेशन एंड लिटरेसी; अनिल स्वरूप से मुलाकात की और समस्याओं से अवगत कराया। इस दौरान स्कूलों की ऑटो

प्राइवेट स्कूलों द्वारा फीस में की जा रही मनमानी वृद्धि को लेकर पैरंट्स मे खासा आक्रोश है। हर नए साल में 30-40 प्रतिशत फीस बढ़ाना सामान्य बात हो गई है। पैरंट्स की मांग है कि सरकार स्कूल मालिकों की इस मनमानी पर अंकुश लगाए। उनकी मांग सही है। शिक्षा को पूरी तरह बाजार पर नहीं छोड़ा जा सकता। लेकिन, सरकारी दखल की अलग समस्याएं है। पूरे देश में सरकारी स्कूलों की बदहाली बताती है कि सरकारी दखल से प्राइवेट स्कूलों का भी यही हाल हो जाएगा।

निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से निर्मित शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई एक्ट 2009) आने और वर्ष 2010 से लागू होने के 7 वर्ष पूरे हो चुके हैं। लेकिन इतनी बड़ी समयावधि बीत जाने के बाद भी तमाम समस्याएं अब भी बरकरार हैं। एक तरफ स्कूल आरटीई के प्रावधानों को अव्यवहारिक बताकर इसकी मुखालफत कर रहे हैं वहीं सरकार हर हाल में उन प्रावधानों को लागू कराना चाहती है। तय समय सीमा के भीतर प्रावधानों के लागू न किए जाने की दशा में स्कूलों पर तगड़े जुर्माने और उन्हें बंद करने का नियम है। गैर आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक आरटीई कानून आने के बाद स

इसमें कोई शक नहीं कि किसी भी क्षेत्र में, चाहें वो सेवा का क्षेत्र हो अथवा उत्पादन का, जबतक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा वाली स्थिति नहीं होती है तबतक गुणवत्ता और पारदर्शिता दोनों का अभाव बना रहता है। प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ गुणवत्ता और पारदर्शिता के लिए मूल्यांकन का होना नितांत आवश्यक है। आज जब प्रश्न शिक्षा में गुणवत्ता का उठता है तो बहस को सरकारी बनाम निजी स्कूल की तरफ मोड़ देने का चलन है। यह मुद्दे से ध्यान भटकाने वाली स्थिति भर है। सवाल यह कभी नहीं होना चाहिए कि शिक्षा सरकारी हो या प्राइवेट?

हमारे आस पास तमाम ऐसी घटनाएं घटित होती हैं जो अखबारों की सुर्खियां नहीं बन पाती लेकिन अक्सर समाज में बदलाव लाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। परिवर्तन की ऐसी ही एक सकारात्मक बयार  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी के अमरा गांव में भी बहती महसूस की जा सकती है। इसकी शुरूआत एक स्वयं सहायता समूह की प्रेरणा से स्थानीय स्कूल में पढ़ने वाले 10-12 वर्ष के कुछ छात्र-छात्राओं द्वारा स्कूल न जाने वाले बच्चों को पढ़ाने के काम से शुरू हुई। स्कूली बच्चे गांव के खेत-खलिहान के आस पास के अन्य बच्चों को बैठाकर पढ़ाना शुरू किया। इन

बीते दिनों केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने 10वीं कक्षा में बोर्ड की परीक्षा को पुनः अनिवार्य बनाने पर अपनी सहमति दे दी। इसके साथ ही राज्यों को पांचवी कक्षा के बाद परीक्षा कराने की भी दे दी गई। राजस्थान सहित कई राज्यों ने छठीं व आगे की कक्षा में परीक्षा कराने की गैर आधिकारिक घोषणा भी कर दी। 10वीं में बोर्ड की परीक्षा व छठीं तथा आगे की कक्षा में वार्षिक परीक्षा पद्धति वापस लाने के पीछे छात्रों द्वारा लापरवाही करने और पढ़ाई पर ध्यान न देने को प्रमुख वजह बताया गया है। इसे तर्कसंगत साबित करने के लिए राज्यों द्वारा तमाम सरकारी,

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