शिक्षा

शिक्षक हूँ, पर ये मत सोचो,
बच्चों को सिखाने बैठा हूँ..
मैं डाक बनाने बैठा हूँ ,
मैं कहाँ पढ़ाने बैठा हूँ।
कक्षा में जाने से पहले
भोजन तैयार कराना है...
ईंधन का इंतजाम करना
फिर सब्जी लेने जाना है।
गेहूँ ,चावल, मिर्ची, धनिया
का हिसाब लगाने बैठा हूँ,
मैं कहाँ पढ़ाने बैठा हूँ ...
कितने एस.सी. कितने बी.सी.
कितने जनरल दाखिले हुए,
कितने आधार बने अब तक
कितनों के खाते खुले हुए
बस यहाँ कागजों में उलझा
निज साख बचाने बैठा हूँ

प्राइवेट स्कूल प्रत्येक वर्ष फीस में कुछ न कुछ बढ़ोतरी अवश्य करते हैं। बच्चों को मिलने वाली गुणवत्ता युक्त शिक्षा के ऐवज में आमतौर पर अभिभावकों यह स्वीकार्य भी होता है। हालांकि, हाल फिलहाल में अलग अलग मदों में होने वाली फीस वृद्धि को अनापेक्षित व अनावश्यक बताते हुए अभिभावकों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया है। वे अब सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन करने लगे हैं।

शिक्षा के क्षेत्र में हमें गुणवत्ता पर केन्द्रित रहना चाहिये और यह सुनिश्चित करना चाहिये कि दाखिला प्राप्त करने वाला प्रत्येक विद्यार्थी सीखने के लक्ष्य की सबसे सीधी राह को पा सकें।

राजधानी दिल्ली के शिक्षा निदेशालय के हवाले से मीडिया में प्रकाशित खबरों के मुताबिक शैक्षणिक सत्र 2017-18 में ईडब्लूएस कैटेगरी के तहत नर्सरी कक्षाओं दाखिलों के लिए कुल 1,13,991 आवेदन प्राप्त हुए। बीते दिनों निदेशालय द्वारा लॉटरी/ ड्रॉ प्रक्रिया के बाद कुल उपलब्ध 31,653 सीटों के लिए पहली सूची जारी की गयी। निजी स्कूलों में दाखिले की इच्छा रखने वाले 82,338 छात्रों के अभिभावकों के लिए उहापोह की स्थिति बनी हुई है। उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि उनके बच्चों को दाखिला कैसे मिलेगा।

अनएडेड प्राइवेट स्कूलों के फीस को रेग्युलेट करना दरअसल, टीएमए पई बनाम कर्नाटक सरकार मामले में सर्वोच्च न्यायालय के 11 सदस्यीय खण्डपीठ के फैसले की अवज्ञा है। सरकार द्वारा अनएडेड प्राइवेट स्कूलों के फीस को रेग्युलेट करना, न केवल संविधान द्वारा उन्हें प्रदत्त संरक्षण का स्पष्ट उल्लंघन है बल्कि निष्प्रभावी और अबाध्यकारी भी है। निसा के माध्यम से हमने इस मुद्दे को उठाया है और बार-बार दोहराया भी है कि ऐसी कार्रवाई माननीय सर्वोच्च न्यायालय 11 न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ के निर्णय का अपमान है और माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की अवमानना करना ह

किसी देश का भविष्य वहां के बच्चों को मिलने वाली प्राथमिक शिक्षा पर निर्भर करता है। प्रारम्भिक शिक्षा जिस प्रकार की होगी देश का भविष्य भी उसी प्रकार निर्धारित होगा। 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति आजादी के बाद इतिहास में एक अहम कदम थी। उसका उद्देश्य राष्ट्र की प्रगति को बढ़ाना तथा सामान्य नागरिकता व संस्कृति और राष्ट्रीय एकता की भावना को सुदृढ़ करना था। 1968 की नीति लागू होने के बाद देश में शिक्षा का व्यापक प्रसार भी हुआ। 

ऐसा प्रतीत होता है कि आजादी के सात दशक बीतने के बाद भी सरकारें यह नहीं समझ सकी हैं कि देश के नौनिहालों को गुणवत्ता युक्त शिक्षा प्रदान करने के लिए बच्चों को केवल स्कूल तक पहुंचा देने भर से ही काम नहीं बनेगा। तमाम सरकारी एवं गैरसरकारी आंकड़ें यह सिद्ध करने के लिए काफी हैं कि शिक्षा का अधिकार कानून, मिड डे मिल योजना, निशुल्क पुस्तकें, यूनिफार्म आदि योजनाओं के परिणामस्वरूप स्कूलों में दाखिला लेने वालों की संख्या तो बढ़ी हैं लेकिन छात्रों के सीखने का स्तर बेहद ही खराब रहा है। देश में भारी तादात में छात्र गणित, अंग्रेजी जैसे विषय ही नहीं, बल्कि सा

दो दशक पूर्व लाइसेंस, परमिट, कोटा आधारित प्रशासनिक व्यवस्था के दौर में जब अधिकांश सेवा प्रदाता कंपनियां सार्वजनिक क्षेत्र की यानि सरकारी हुआ करती थीं तब उपभोक्ताओं के लिए उन सेवाओं को हासिल करना टेढ़ी खीर हुआ करती थीं। बात चाहे हवाई जहाज की यात्रा करने की हो या टेलीफोन कनेक्शन लेने की, ऐसी सेवाएं लग्जरी की श्रेणी में शामिल हुआ करतीं थीं और स्टेटस सिंबल के तौर पर जानी जाती थीं और मध्यवर्ग के लिए ऐसा कर पाना किसी बड़े सपने के पूरा होने से कम नहीं हुआ करता था। इसके अलावा सेवा की गुणवत्ता की बात करना तो जैसे दूसरी दुनियां की बात थी। लेकिन आज परिस

पिछले कुछ वर्षों के भीतर देश में छोटे छोटे पब्लिक स्कूलों की संख्या अचानक से बढ़ी हैं। ऐसे स्कूल जिनमें 20 या उससे भी कम छात्र होते हैं। देश की शिक्षा व्यवस्था के त्रासदीपूर्ण आंकड़ों से परेशान होना एक सामान्य-सी बात हो गई है। स्कूली छात्रों की अध्ययन की उपल्बधियां दयनीय ढंग से कम हो रही हैं और लगातार नीचे ही गिर रही हैं। इसके साथ ही बोर्ड परीक्षाओं के दौरान बढ़ती सार्वजनिक रूप से होनेवाली नकल और शिक्षकों की अनुपस्थित भी इसकी एक वजह है। हालांकि, शिक्षा के लिए बनी जिला सूचना प्रणाली यानि कि डायस के आंकड़े ये जाहिर करते हैं कि इसके पीछे कि वजह

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