शिक्षा

मनीष सभरवाल भारत की अग्रणी स्टाफिंग कम्पनी 'टीम लीस सर्विसेस' के चेयरमैन और स-संस्थापक हैं. कुछ ही साल पुरानी 'टीम लीस सर्विसेस' के आज भारत में 870 जगहों पर आफिस हैं जहां से वो अस्थायी और स्थायी नौकरियां लगवाने का काम करती है. अमरीका के मशहूर वार्टन स्कूल के पढे हुए श्री सभरवाल ग्यारवीं पंचवर्षीय योजना के लिए प्लानिंग कमीशन की लेबर व रोज़गार सम्बन्धी कमेटी के मेम्बर रह चुके हैं तथा प्रधान मंत्री की कौशल विकास काउन्सिल का भी हिस्सा हैं.

पेशे से भौतिक शास्त्री रहे विनोद रैना भारत में जन विज्ञान आन्दोलन के प्रणेता रहे हैं. इन्होने ऑल इंडिया पीपल साइंस नेटवर्क और भारत ज्ञान विज्ञान समिति के जन्म में मदद की. वो पिछले दो दशको से एकलव्य नामक वैकल्पिक शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रही एक NGO के संस्थापक सदस्य भी रहे हैं. रैना केंद्रीय शिक्षा सलाहकार परिषद के सदस्य हैं जिसने हाल में बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार एक्ट, 2009(शिक्षा का अधिकार एक्ट) की रचना की.

उत्तर प्रदेश में रहने वाली तेरह साल की बानो खान कहती हैं कि उनके जैसे बहुत सारे बच्चे हैं जो गरीब परिवारों से होने की वजह से काम पर जाते हैं, क्योंकि उनके घर के आसपास कोई अच्छे स्कूल नहीं होते हैं. "मेरे घर से सबसे पास का स्कूल 2.5 किलोमीटर दूर है, और मेरे घरवाले हर महीने 200 रूप्ए बस किराया नहीं दे सकते हैं." स्थानीय बच्चों के समूह की अध्यक्षा बानो खान का परिवार बदली इंडस्ट्रीय एरिया में सड़क किनारे एक चाय की दुकान चलाता है. बच्चों के लिए मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा के अधिकार अधिनियम, में तीन किलोमीटर के भीतर एक उच्च प्राथमिक स्कूल खोले जाने का प्रावधान है.

एजुकेशनल इनिशिएटिव्स द्वारा भारत में शिक्षा के क्षेत्र में एक सर्वेक्षण के अनुसार केरल, महाराष्ट्र, उड़ीसा और कर्नाटक सभी बिन्दुओं में आगे रहे. जबकि सब से खराब प्रदर्शन रहा जम्मू और कश्मीर, मध्य प्रदेश व राजस्थान का.

‘स्टुडेंट लर्निंग स्टडी’ (SLS) नामक यह सर्वेक्षण मशहूर इन्टरनेट कम्पनी गूगल की वित्तीय सहायता से कराया जाता है. भारत के 18 राज्यों के 48 जिलों और 1 संघ शासित क्षेत्र में यह सर्वेक्षण करवाया गया. देश भर में से 2399 चुनिन्दा सरकारी स्कूलों में कक्षा 4, 6, और 8 में पढने वाले करीब 101643 बच्चों पर यह सर्वेक्षण करवाया गया.

इस वीडिओ में सत्यवान वर्मा हरयाणा के ईंटा भट्टों में बाल श्रमिकों के हालात पर जानकारी दे रहे हैं. यहाँ काम करने वाले ज़्यादातर बच्चे 14 वर्ष की उम्र से कम हैं. शिक्षा के अधिकार से पूरी तरह वंचित ये बच्चे जिस जगह रहते हैं, वहाँ आस पास कोई स्कूल नहीं है.

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के डालीगंज क्षेत्र में सिर्फ एक कमरे में ये सरकारी स्कूल चलता है. बच्चों की सुविधा का ध्यान तो दूर की बात, उन्हे पीने के पानी और शौच की सुविधा भी उपलब्ध नहीं है.

आदर्श नियमों में इस बात को लेकर कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है कि आखिर निजी स्कूलों में 25 फीसदी आरक्षण को किस तरह से लागू किया जाएगा। शिक्षा के अधिकार अधिनियम को कारगर बनाने के लिए जरुरी है कि कुछ महत्वपूर्ण सवालों के व्यवस्थित तरीके से विस्तृत जवाब दिए जाएं-

शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम 2009 दरअसल 86वें संवैधानिक संशोधन के तहत मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के सार्वभौमिक अधिकार को सुनिश्चित करने की ही एक वैधानिक कोशिश है। इसके मुख्य बिंदु हैं-

उत्तर प्रदेश में लगभग चार हजार करोड़ रु. से ज्यादा धन स्मारकों, पार्कों के निर्माण और उनके रख-रखाव पर खर्च किया जा रहा है। लेकिन बात जब शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) को लागू करने की आती है तो राज्य की मुख्यमंत्री केंद्र से अनुदान की दरकार के नाम पर आरटीई को लागू करने से कदम पीछे हटाती नजर आती हैं। यह हालत सिर्फ उत्तर प्रदेश की ही नहीं है बल्कि केंद्र को चिठ्ठी लिख कर फंड मांगने वालों में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान,  गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और बिहार के नीतीश कुमार भी शामिल हैं।

इस सवाल का जो लगभग अनबूझ जवाब मैंने दिया है उसका महत्व समझने में कुछ पल का वक्त लगेगा, मैं यह कह रहा हूं कि स्कूलों के बीच प्रतिस्पर्धा संबंधित स्कूलों, परिवारों और कुल मिलाकर समाज के लिए या तो अच्छी हो सकती है या फिर बुरी। यह सब परिस्थितियों पर निर्भर है, जिसमें कानून

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