शिक्षा

सरकार महंगाई पर काबू पाना चाहती है, इसलिए आरबीआइ ने ब्याज दर में वृद्धि की है. इसके पीछे यह सोच है कि ब्याज दर में वृद्धि के कारण कंपनियां कम कर्ज लेंगी और निवेश कम करेंगी. इससे बाजार में सीमेंट, स्टील और श्रम की मांग घटेगी. मांग घटने से महंगाई नियंत्रण में आयेगी. सरकार की इस पॉलिसी से महंगाई पर कुछ नियंत्रण अवश्य होगा, परंतु महंगाई की मूल समस्या का समाधान नहीं होगा. महंगाई का पहला कारण सरकारी खर्चे में वृद्धि है. पिछले दो वर्षो में वैश्विक मंदी से अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए सरकार ने खर्चो में वृद्धि की थी. इससे महंगाई बढ़ रही है. अब इस वृद्धि को वापस लेने की जरूरत है.

बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा अधिनियम 2009 के पास हो जाने के बाद उम्मीद बढ़ी थी कि देश में प्राइमरी स्कूलों की शिक्षा के प्रबंध में भारी बदलाव आयेगा. 6 से 14 साल तक के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के लिए बनाए गे इस कानून में बहुत कमियाँ हैं और इसको लागू करने की दिशा में ज़रूरी राजनीतिक इच्छाशक्ति का  भी अभाव है. 1991 में जब मौजूदा प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने पी वी नरसिम्हा राव की सरकार में वित्त मंत्री के रूप में कम संभाला था, उसके बाद से ही शिक्षा को अति महत्वपूर्ण मुकाम पर रख दिया गया था. डॉ मनमोहन ने वित्त मंत्री के रूप में उदारीकरण और वैश्वीकरण की जिन नीतियों का सूत्रपात किया था उन्हें बाद में आने वाली सरकारें भी नहीं  रोक सकीं.

सरकार के उत्तरदायित्व समूह के एक अनुमान के अनुसार, मौजूदा सरकारी स्कूलों में पिछले साल लागू हुए शिक्षा के नियमों  के तहत काम करने के लिए 152 बिलियन रुपए या करीब 3.4 बिलियन डॉलर का खर्च आ सकता है।

कानून के तहत 6 से 14 साल के सभी बच्चों की नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा के आदेश को पूरा करने के लिए इससे तीन गुना रकम या 11 बिलियन डॉलर की ज़रूरत पड़ सकती है।

सभी सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों को पाबंद किया जाए कि उनके बच्चे सरकारी स्कूलों में ही पढेंगे। इसके लिए दो बच्चों की फीस का पुर्नभरण किया जा सकता है। निजी स्कूलों में यदि किसी अधिकारी-कर्मचारी के बच्चे पढ़ते हुए पाए जाएं तो न केवल पुर्नभरण की गई राशि की वसूली हो, बल्कि उसी सभी पदोन्नतियां रोक दी जाएं। इससे सरकारी अधिकारी और कर्मचारी स्कूलों और व्यवस्थाओं का विशेष ध्यान रखेंगे। जिस स्कूल का परीक्षा परिणाम सबसे ज्यादा खराब हो, उस विद्यालय के अध्यापकों के सजा के तौर पर दूरदराज वाले इलाकों में तबादले किए जाएं। फिर उन्हें अपने गृह जिले में आने की अनुमति नहीं मिले। सरकारी स्कूलों में जन प्रतिनिधयों का हस्तक्षेप कम हो, ताकि वहां किसी तरह की राजनीति न हो सके। बेहतर परिणाम देने के लिए अध्यापक यदि अतिरिक्त क्लास लेकर बच्चों के साथ मेहनत करता है तो उसे राज्य स्तर पर सम्मानित किया जाना चाहिए।

आमतौर पर लोग सोचते हैं कि गरीबों के लिए अनुदान सहायता (डॉनर एड) के रूप में लोक शिक्षा पर अरबों-खरबों डॉलर और अधिक खर्च करने की जरूरत है। लेकिन यह इस सच्चाई को नजरंदाज करता है कि गरीब अभिभावक सरकारी स्कूलों को छोड़ कर अपने बच्चों को बजट प्राइवेट स्कूलों में भेज रहे हैं। ये बजट प्राइवेट स्कूल बहुत कम शुल्क लेते हैं, जो दिहाड़ी पर काम करने वाले अत्यधिक गरीब अभिभावकों द्वारा आसानी से वहन किया जा सकता है।

बुन्देलखण्ड के चार जनपद बांदा, चित्रकूट, महोबा, हमीरपुर में बीते ढाई दशकों से प्राकृतिक संपदाओं की बेइतहां लूट जारी है। लूट के दुष्परिणामों का असर किसानों, मजदूरों और अन्य श्रमजीवियों पर पड़ रहा है। घटता जलस्तर, भू-प्रदूषण, कम होती वर्षा, विस्थापित होते हुए किसान-मजदूर और साल दर साल बदहाल होती खेती इसके बड़ी सामान्य उदाहरण हैं।

 

भारत में शिक्षा का अधिकार कानून के प्रणेता विनोद रैना यहाँ इस कानून से जुड़े परिणामो, खास तौर पर निजी स्कूलों के रोल के बारे में चर्चा कर रहे हैं. उन के अनुसार शिक्षा का अधिकार कानून देश में सर्व जन, खासतौर पर निचले तबको के बच्चो को उत्कृष्ट शिक्षा प्रदान करने में एक अहम् रोल अदा करेगा.

इक्कीसवी सदी में शिक्षित मानव संसाधन हमारे देश की सब से बड़ी ज़रूरतों में से एक है. जैसे जैसे हमारी अर्थव्यवस्था बढ़ रही है, वैसे ही हमारी ये मांग बढ़ती जा रही है. करोड़ो युवा भारतीयों को हम किस गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान करेंगे? क्या हम सिर्फ साक्षरता पर केन्द्रित रह कर, शिक्षा को नज़रंदाज़ करेंगे? क्या सरकार अकेले इस मांग को पूरा कर पायेगी? क्या परोपकारी संगठन और निजी सेक्टर इस मुहीम में बड़ा रोल अदा कर पायेंगे? ये सभी कुछ ऐसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न हैं जिनका हमें मिलजुल कर उत्तर देना होगा.

आजादी के छह दशक से अधिक समय गुजरने के बावजूद आज भी देश में सबके लिए शिक्षा एक सपना ही बना हुआ है। देश में भले ही शिक्षा व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त बनाने की कवायद जारी है, लेकिन देश की बड़ी आबादी के गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर करने के मद्देनजर सभी लोगों को साक्षर बनाना अभी भी चुनौती बनी हुई है।

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