शिक्षा का स्तर

आज से ठीक पांच साल पहले १ अप्रैल २०१० को 'शिक्षा का अधिकार' क़ानून ८६वें संशोधन के तहत लागू किया गया था। इस क़ानून को लागू करने के पीछे मुख्य उद्देश्य यही था कि 6 वर्ष से 14 वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त शिक्षा की गारंटी दी जाय। इस क़ानून के लागू होने के बाद शिक्षा प्राप्त करना न सिर्फ हर बच्चे का अधिकार बना बल्कि सरकार की यह जवाबदेही तय हो गयी कि वो 6 से 14 साल के प्रत्येक बच्चे की शिक्षा सुनिश्चित कर सके। प्रथम दृष्टया जब इस  कानून और  इसके उद्देश्यों को देखते हैं तो बेहद आदर्श स्थिति नजर आती है। ऐसा लगता है कि सबको शिक्षा मुहैया कराने

भारत के सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर भले ही निचला हो, लेकिन यहं के सरकारी स्कूलों में पढ़ा रहे शिक्षकों के वेतन पर चीन और जापान के मुकाबले भारत ज्यादा खर्च कर रहा है। भारत के 9 राज्यों (यूपी, झारखंड, राजस्थान, पंजाब, तमिलनाडु, कर्नाटक, मिजोरम, छत्तीसगढ़) में सकल घरेलू उत्पाद का 3.0 फीसदी खर्च शिक्षकों के वेतन पर हो रहा है, जबकि शिक्षकों के वेतन पर अन्य एशियाई देश कई गुना कम खर्च कर रहे हैं।

कैबिनेट द्वारा अनुमोदित बाल मजदूरी पर प्रस्तावित अधिनियम को मीडिया बाल मजदूरी को बदावा देने वाला एक पिछडा कदम बता रही है। वास्तव में, यह अधिनियम बाल मजदूरी को लगभग पूरी तरह से प्रतिबंधित  करता है।