शिक्षा

7 अप्रैल को शिक्षा बचाओ ‘सेव एजुकेशन’ अभियान के समर्थन में देश भर के निजी स्कूल दिल्ली के रामलीला मैदान में इकट्ठा हुए। भारत के 70 वर्षोँ के इतिहास में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। ये स्कूल शिक्षा के क्षेत्र में ‘लाइसेंस परमिट राज’ के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे और शैक्षिक संस्थानोँ के लिए स्वायत्तता और सम्मान की मांग कर रहे थे। यहाँ पहुंचने वाले लगभग 65,000 प्रतिनिधियोँ में से अधिकतर प्रिंसिपल, शिक्षक, कम फीस लेने वाले स्कूलोँ में अपने बच्चोँ को पढ़ाने वाले माता-पिता थे। लेकिन इनके अलावा यहाँ अल्पसंख्यक संस्थान जैसे कि कैथलिक स्कूलोँ के प्रतिनिधि

Author: 
गुरचरण दास

सहल कौशिक इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी ज्वाइंट एंटरेंस एग्जामिनेशन (आईआईटी जेईईई) की बेहद प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले अब तक के सबसे कम उम्र के छात्र हैं। वर्ष 2010 में उन्होंने महज 14 साल की छोटी सी उम्र में देशभर में 33वाँ और दिल्ली में पहला रैंक हासिल किया था। सहल ने किसी स्कूल में पढ़ाई नहीँ की थी। उन्होंने घर में ही पढ़ाई की थी। पिछ्ले कुछ वर्षोँ में बहुत सारे पैरेंट्स ने होम स्कूलिंग के विकल्प को अपनाया है, क्योंकि परंपरागत स्कूलों की कई खामियों के कारण वे अपने बच्चोँ को वहां नहीं भेजना चाहते थे। उन्हेँ स्कूलोँ द्वारा बच्चोँ की समस्याओँ को सुलझाने

दिल्ली में कम फीस वाले 3 हजार बजट प्राइवेट स्कूलों को बंद करने का फैसला लिया गया है। सरकार के इस फैसले के कारण 10 लाख बच्चों और उनमें पढ़ाने वाले 30 हजार अध्यापकों का भविष्य अधर में लटक गया है। विशेष बात यह है कि निर्विवादित तौर पर इन स्कूलों की गुणवत्ता सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता की तुलना में बेहतर है वह भी बेहद की कम खर्च पर.. - वीडियो साभारः आजतक

कहते है आईटी और आईआइएम में दाखिला लेना आसान है बनिस्पत अच्छे नर्सरी स्कूलों के। क्योंकि आईआईटी और आईआईएम में दाखिले के लिए इम्तिहान छात्र देते है और निजी स्कूलों में उनके अभिभावक। किस्मत और आपकी जेब इसका फैसला करतीहै कि आपका बच्चा फलां स्कूल में जाने लायक है भी या नही। कितने सूटकेस में पैसा और सिफारिशी पत्र आपने सलंग्न किये है दाखिला इसपर निर्भर करता है। इतने जतन प्रयत्न के बाद अगर दाखिल मिल जाये तो अभिभावक की स्थिति एक बंधक की भांति हो जाती है जो स्कूलो के सही गलत सब नियम मानने को मजबूर हो जाते हैं। हर साल कितनी फीस बढ़ेगी, किताबे कहाँ से आएं

मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का गोपाल कृष्ण गोखले की कोशिश को भले ही ब्रिटिश विधान परिषद ने 18 मार्च 1910 को खारिज कर दिया, लेकिन इसके ठीक 99 साल बाद इतिहास बदला गया। आजाद भारत की संसद ने शिक्षा के अधिकार को संवैधानिक दर्जा देकर स्वतंत्रता सेनानियों के सपने को तो पूरा किया ही, भारतीय भविष्य को बेहतर मानव संसाधन के तौर पर विकसित करने की दिशा में नई राह ही खोल दी। जैसा कि अक्सर होता है, कानूनों के अपने पेंच और प्रावधान भी कई बार अपने मूल उद्देश्यों की राह में रोड़े बनने लगते हैं, शिक्षा का अधिकार कानून भी इसी राह पर चल पड़ा है। इसका असर यह हुआ है क

मौजूदा समय में भारतीय शिक्षा के क्षेत्र में नीतियां बनाने, नियमन (रेग्युलेशन) करने और सेवा प्रदान (सर्विस डिलिवरी) करने जैसे सारे सरकारी कामों की जिम्मेदारी एक ही संस्था के जिम्मे है। हालांकि, जरूरत इन सारे कामों को तीन अलग अलग हिस्सों में बांटने की है और इन तीनोँ के बीच संबंधों में वैसी ही स्पष्ट दूरी होनी चाहिए जैसे कि वित्त, टेलीकॉम और विद्युत क्षेत्र में है। ऐसा करने से नीति निर्धारण और नियमन दोनों के श्रेष्ठ क्रियान्वयन के लिए पर्याप्त क्षमता बढ़ेगी जो कि फिलहाल सेवा प्रदान करने की जिम्मेदारी के कारण अवरुद्ध हो जाती है। जिम्मेदारियों को

देश में शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के बाद से ही गैर मान्यता प्राप्त निजी स्कूल राज्य सरकारों के निशाने पर हैं। राज्यों के शिक्षा विभागों के बीच अधिक से अधिक स्कूलों को बंद करने की अघोषित प्रतिस्पर्धा सी छिड़ी प्रतीत होती है। उत्तर प्रदेश, हरियाणा, केरल और तमिलनाडू ऐसे स्कूलों को बंद करने के लिए नोटिस जारी करने के मामले में शीर्ष के राज्यों में शामिल हैं। हाल ही में दिल्ली सरकार ने अप्रत्याशित फैसले के तहत एक पब्लिक सर्क्युलर जारी कर गैर मान्यता प्राप्त स्कूलों से आगामी सत्र (अप्रैल 2018) से समस्त शैक्षणिक गतिविधियों को बंद करने का फरमान

“एपीजे अब्दुल कलाम की नई पीढ़ी को आगे बढ़ने का अवसर” देने के लिए द टाइम्स ऑफ इंडिया ने 400 छात्रोँ के लिए स्कॉलरशिप की शुरुआत की है ताकि उन्हे बेहतरीन शिक्षा हासिल हो सके। यह एक सराहनीय कदम है, लेकिन देश की बढ़ती आबादी और शिक्षा प्राप्त करने के उम्मीदवार छात्रोँ को संख्या की तुलना में यह बेहद कम है। यहाँ यह कहना भी जरूरी है कि हमारे देश की आने वाली युवा पीढ़ी अच्छी शिक्षा हासिल करने और अपनी क्षमताओँ के अनुकूल अवसर पाने हेतु धर्मार्थ पर निर्भर नहीं होनी चाहिए। यह सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिए।

जर्मनी में किसी ऐसे छात्र को ढूंढना जो शिक्षा को एक बोझ समझता हो, किसी चुनौती से कम नहीं है। हाल ही में संपन्न हुई जर्मनी की मेरी यात्रा के दौरान ऐसे किसी छात्र को ढूंढना मेरी यात्रा का एक अनिवार्य हिस्सा बन गया था जबकि मैं वहां एक अंतर्राष्ट्रीय कार्यशाला ‘क्राइसिस इन एजुकेशन – ए लिबरल वे फॉरवर्ड’ में शामिल होने के लिए गया था। इस कार्यशाला का उद्देश्य पब्लिक पॉलिसी से लेकर नवोचार युक्त खेलों को तैयार करने जैसे शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत 16 देशों के 26 प्रतिस्पर्धियों के मध्य परस्पर संवाद स्थापित को प्रोत्साहित करने के लिए एक मंच

गुरुग्राम स्थित रेयान इंटरनेशनल स्कूल के छात्र प्रद्युम्न की स्कूल परिसर में हुई हत्या और शुरूआती जांच में स्कूल बस कंडक्टर का नाम सामने आने के बाद से जिस प्रकार गैरशैक्षणिक कर्मचारियों विशेषकर ड्राइवरों और कंडक्टरों के साथ सुरक्षा के नाम पर दोयम व्यवहार किया जाने लगा उससे उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची है..

Pages