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क्या सिर्फ कुर्सी पर बैठा भर लेने से नारी को सशक्त बनाया जा सकता है? नहीं- इस के लिए तो सबसे पहले हमें अपनी सोच बदलनी होगी और नारी को भी अपने  विचारों को और आचरण से सुदृढ़ बनाना होगा। अगर कुर्सी पर बैठो तो फिर इंदिरा बनो, लक्ष्मी बाई बनो बनो। तब सार्थकता है कि नारी भी नर के कंधे से कन्धा मिलाकर चल सकती है और वे उसको अपनी सहयोगी और समकक्ष समझ सकते हैं।

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मिस्र ‘आज़ाद’ हो गया। यह एक ऐतिहासिक लम्हा है। अरब देशों के इतिहास में यह पहला मौक़ा है जब जनता के दबाव में शासक को झुकना पड़ा हो। बहुत सारे लोग इस क्षण में क्रांति की अनन्त सम्भावनाएं देख सकते हैं। पर मेरा नज़रिया हमेशा की तरह थोड़ा संशयपूर्ण है। ये कोई समाजवादी क्रांति नहीं है। ये सर्वहारा का जयघोष भी नहीं है। ये व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन की लड़ाई भी नहीं है। इस आन्दोलन में पहले से बने-बनाए समीकरण आरोपित करने के बजाए इसको इसकी सीमाओं में पहचानने की ज़रूरत है। ये कैसी आज़ादी है? किस से आज़ादी है?

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वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने इस बार के बजट में गरीबो, किसानों, उद्यमियों के साथ आम उपभोक्ताओं को खुश करने के लिए कई नए कदम उठाये हैं.

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ट्यूनीशिया और मिस्त्र की घटनाओं के बाद भारत में भी लोग पूछने लगे है कि इस देश में ऐसी क्रांति क्यों नहीं आ सकती? भारत के भी हालात तो ऐसे ही है, जिनमें एक बड़ी उथल-पुथल की जरूरत है। बेरोजगारी, गरीबी, महंगाई, भ्रष्टाचार, दमन तथा राष्ट्रीय स्वाभिमान के समर्पण की जिन पीड़ाओं ने वहां की जनता को उद्वेलित किया, उनसे भारत के लोग भी कम त्रस्त नहीं है। पिछले दिनों भीषण महंगाई, भयंकर बेकारी, किसानों की निरंतर आत्महत्याओं और घोटालों के एक से एक बढ़ चढ़ कर उजागर होते कारनामों ने पूरे देश के जनमानस को बुरी तरह बेचैन किया। किंतु क्या करें - ऐसी एक बेबसी व दिशाहीनता लोगों के मन में छाई है।

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बड़ी आपदाएं निरंतर आती रहती हैं। एशिया के आर्थिक संकट ने एशिया की चमत्कारिक अर्थव्यवस्था को तहस नहस कर दिया। 2007-09 की महामंदी ने वॉल स्ट्रीट के पांच शीर्ष निवेश बैंकों, सबसे बड़े बैंक (सिटी बैंक), सबसे बड़ी इंश्योरेंस कंपनी (एआईजी), सबसे बड़ी वाहन निर्माता कंपनी (जनरल मोटर्स) और सबसे बड़ी बंधक एवं बीमा कंपनी (फैनी मे और फ्रेडी मैक) को दीवालियेपन / राहत की कगार पर पहुंचा दिया। कैरिबियन सागर में हुई बीपी दुर्घटना दुनिया की सबसे बड़ी पर्यावरण त्रासदी मानी जाती है। कुछ लोगों को डर है कि ग्लोबल वार्मिंग अब तक का सबसे बड़ा मानवनिर्मित संकट होगा।

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

बहुत साल बाद कोलकाता जाने का मौक़ा लगा. तीन दिन की इस कोलकाता यात्रा ने कई भ्रम साफ़ कर दिया. ज्यादा लोगों से न मिलने का फायदा भी होता है. बातें बहुत साफ़ नज़र आने लगती हैं. जनता के राज के ३३ साल बहुत अच्छे लग रहे थे. लेकिन जब वहां कुछ अपने पुराने दोस्तों से मुलाक़ात हुई तो सन्न रह गया. जनवादी जनादेश के बाद सत्ता में आयी कम्युनिस्ट पार्टियों की राजनीति की चिन्दियाँ हवा में नज़र आने लगीं. नंदीग्राम में जब तूफ़ान शुरू हुआ तो वहां एक भी आदमी तृणमूल कांग्रेस का सदस्य नहीं था. जो लोग वहां सरकार के खिलाफ उठ खड़े हुए थे वे सभी सी पी एम के मेम्बर थे और वे वहां के सी पी एम के मुकामी नेताओं के खिलाफ उठ खड़े हुए थे. कोलकता की राइटर्स बिल्डिंग में बैठे बाबू लोगों को जनता का उठ खड़ा होना नागवार गुज़रा और अपनी पार्टी के मुकामी ठगों को बचाने के लिए सरकारी पुलिस आदि का इस्तेमाल होने लगा. सच्ची बात यह है कि वहां सी पी एम के दबदबे के वक़्त में तो वाम मोर्चे के अलावा और किसी पार्टी का कोई बंदा घुस ही नहीं सकता था. 

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रिक सैंटोरम 1995 से लेकर 2007 तक अमेरिका में पैनसिलवेनिया के सीनेटर थे। वह अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव में भी रह चुके हैं

जॉन सी बोगले वैनगार्ड के संस्थापक और पूर्व सीईओ है। वह बोगले फाइनेंसियल मार्केट रिसर्च सेंटर के अध्यक्ष भी हैं।

सोमालिया में पैदा हुई अयान हिरसी अली 1992 में नीदरलैंड चली आईं, जहां वह 2003 से  2006 तक सांसद रहीं। वह बेस्ट सेलर इन्फीडेल की लेखिका भी हैं।

रॉबर्ट बी रेख अमेरिका के बर्कले में यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया में पब्लिक पॉलिसी के प्रोफेसर हैं। वह पब्लिक पॉलिसी पर 12 किताब लिख चुके हैं और तीन अमेरिकी सरकार के लिए भी काम किया है। वह क्लिंटन के कार्यकाल में श्रम मंत्री भी रह चुके हैं।

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