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जॉन ग्रे लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में एमेरिटस प्रोफेसर हैं।

जगदीश भगवती कोलंबिया यूनिवर्सिटी में इकोनॉमिक्स और लॉ के यूनिवर्सिटी प्रोफेसर हैं। वह इन डिफेंस ऑफ ग्लोबलाइजेशन नाम की किताब के लेखक भी है और आम नीतियों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर लिखते हैं।

विद्युत क्षेत्र की बात की जाए तो वितरण का मुद्दा लंबे समय से विवादित रहा है। जब भी विद्युत क्षेत्र में सुधार पर कोई भी चर्चा होती है तो वह सीधे बिजली के वितरण और पारेषण में होने वाले नुकसान पर केंद्रित हो जाती है जिसे प्राय: बिजली चोरी भी कहा जाता है। मुफ्त बिजली, उलझे तार, अवैध कनेक्शन, जले हुए ट्रांसफॉर्मर, गलत बिलिंग, बकाया बिल आदि तमाम गड़बडिय़ों के लिए वितरण को जिम्मेदार ठहराया जाता है और संभवत: यह सही भी है। विद्युत उत्पादन एक ऐसा बिंदु है जो अधिकांश लोगों को उत्साहित कर देता था। धीरे धीरे ही सही लेकिन वितरण बिजली क्षेत्र का सबसे आकर्षक काम बनता जा रहा है

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सुप्रीम कोर्ट ने हाल मे सरकार से पूछा कि वह विदेशी बैंकों में ब्लैक मनी जमा करने वाले भारतीय नागरिकों के नाम उजागर करने में आखिर अनिच्छुक क्यों है? विदेशी बैंकों में जमा काले धन के जरिए हथियार सौदों और मादक पदार्थों की तस्करी होने की आशंका को लेकर चिंता जताते हुए, कोर्ट ने ये भी पूछा कि सरकार ने विदेशों में खाता रखने वाले व्यक्तियों और कंपनियों के खिलाफ क्या कदम उठाए हैं।

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चर्चित विचारक फरीद जकारिया अरब जगत में लोकतंत्र न होने के दो कारण बताते हैं-पहला, लोकतंत्र को संस्थागत आधार प्रदान करने के लिए उदार संविधानवाद और पूंजीवाद का अभाव और दूसरा, इनमें से कुछ देशों का ‘ट्रस्ट फंड देश होना’, जहां गरीबी नहीं, बल्कि आसानी से मिलने वाली समृद्धि ही समस्या है। जहां तक पहले का संबंध है, उन्होंने पाया कि पश्चिम को वहां लोकतंत्र के लिए शीघ्रता नहीं करनी चाहिए और दूसरे के संबंध में उन्हें लगा कि बाजार पूंजीवाद के अभाव ने लोकतंत्र के संस्थानीकरण को मुश्किल बना दिया है। शायद बीस वर्ष पहले पूर्वी यूरोप में जो हुआ, उसके मद्देनजर भविष्यवाणियों के बा

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सरकार चंद पूंजीपतियों के लिए रियायतों का अंबार लगा रही है और करोड़ों लोगों की खाद्य सुरक्षा के लिए उसके पास न अनाज है और न पैसे का कोई बंदोबस्त. इंडिया शाइनिंग के इस दौर में सरकार को हजारों करोड़ रुपये का अनाज सड़ा देना मंजूर है. नहीं मंजूर है तो 8 करोड़ से ज्यादा लोगों की भूख को मिटाने के वास्ते उस सड़ते हुए अनाज में से गरीबों के लिए थोड़ा-सा हिस्सा बांटना.

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देश में राजनीति के प्रति लोगों की उदासीनता को देखते हुए 25 जनवरी को देश में मतदाताओं को जागरूक करने के लिए राष्ट्रीय मतदाता दिवस मनाये जाने का संकल्प लिया गया है पर क्या मात्र इस कदम से देश में मतदाताओं में कोई जागरूकता आने वाली है? शायद नहीं क्योंकि हम भारत के लोग कभी भी किसी बात को संजीदगी से तब तक नहीं लेते हैं जब तक पानी सर से ऊपर नहीं हो जाता है. देश में गाँवों आदि में तो फिर भी लोग वोट देने के लिए चले जाते हैं पर हमारे तथाकथित पढ़े लिखे सभी समाज की चुनावों में क्या भूमिका होती है उसको हम सभी जानते हैं.

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केंद्र सरकार ने मौसम आधारित फसल बीमा योजनाओं को लागू तो कर दिया है, लेकिन कई खामियों की वजह से यह किसानों के लिए बहुत उपयोगी साबित नहीं हो पा रही है। राज्य सरकारों की उदासीनता भी कहीं न कहीं इसके लिए जिम्मेदार है।

उद्योग चैंबर फिक्की के अनुसार केंद्र सरकार को सबसे पहले इन स्कीमों के लिए कम से कम तीन वर्ष अवधि की रणनीति बनानी चाहिए। अभी हर फसल मौसम से पहले सरकार इस बारे में ऐलान करती है। इससे बीमा कंपनियों के लिए लंबी अवधि की रणनीति बनाना मुश्किल होता है।

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वाशिंगटन पोस्ट के स्तंभकार मैट मिलर ने वैश्विक पूंजीवाद के बारे में कुछ समय पहले एक टिप्पणी दी जिस में उन्होने कहा कि "वैश्विक पूंजीवाद के चलते चीन, भारत सहित अन्य विकासशील देशों में करोडो लोग गरीबी से बाहर निकल कर अपना स्तर सुधार तो रहे हैं पर आंशिक रूप से ये परिवर्तन अमीर देशो के कई हज़ार वर्करों की नौकरियां जाने की वजह से संभव हो पाया है".

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'आज से आठ दशक और सात साल पूर्व हमारे पूर्वजों ने हमारे इस महादेश में निर्माण किया था एक नए देश का। निर्माण किया था उसका एक खुली आजादी के माहौल में, यह मानते हुए कि हर इंसान हर दूसरे इंसान के बराबर है। कोई भी व्यक्ति किसी से ऊंचा नहीं और ना ही किसी से कोई नीचा है।

और अब हम, उस ही देश की नस्ल, भिड़े हुए हैं एक-दूसरे से एक घमासान जंग में, जो कि यह फैसला कर दिखाएगी कि यह देश या फिर ऐसा कोई भी देश, ऐसी बेहतरीन सोच और ऐसे संकल्प वाला देश, बरकरार रह सकता है भी या नहीं।

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