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-  द्वितीय अंतर्राष्ट्रीय लघु फिल्म प्रतिस्पर्धा ‘एडू-डॉक’ की हुई औपचारिक घोषणा, प्रविष्ठियां भेजने की अंतिम तारीख 30 अक्टूबर
- 3 दिसंबर को प्रतिष्ठित ‘स्कूल च्वाइस नेशनल कांफ्रेंस’ के दौरान इंडिया हैबिटेट सेंटर में होगी स्क्रीनिंग, 3 श्रेष्ठ फिल्में होंगी पुरस्कृत

- पॉलिसी रिव्यू कमेटी का गठन कर बजट प्राइवेट स्कूलों के समक्ष उत्पन्न होने वाली कई समस्याओं का करेंगे समाधान
- दिल्ली के निजी स्कूलों ने अव्यवहारिक ‘लैंड नॉर्म्स’ के कारण पैदा हुई समस्याओं से उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को कराया था अवगत

एक अप्रैल 2010 को ‘शिक्षा का अधिकार’ क़ानून 86वें संशोधन के तहत लागू किया गया था। इस क़ानून को लागू करने के पीछे मुख्य उद्देश्य यही था कि छह वर्ष से चौदह वर्ष तक के बच्चों की मुफ्त शिक्षा को सुनिश्चित किया जाये। इस क़ानून से शिक्षा प्राप्त करना न सिर्फ हर बच्चे का अधिकार बना बल्कि सरकार की भी जवाबदेही तय हो गयी।

- फ्रेजर इंस्टिट्यूट व सेंटर फॉर सिविल सोसायटी द्वारा जारी वैश्विक रैंकिंग में 102 से फिसलकर 112वें स्थान पर पहुंचा भारत
- आर्थिक स्वतंत्रता के मामले में भूटान (78), नेपाल (108) व श्रीलंका (111) से पिछड़ा पर चीन (113), बांग्लादेश (121) व पाकिस्तान (133) से रहा आगे
- आर्थिक रूप से स्वतंत्र देशों की सूची में हांगकांग शीर्ष पर, सिंगापुर व न्यूजीलैंड क्रमशः दूसरे और तीसरे पायदान पर

बड़े व्यापारिक घराने उच्च मजदूरी दर (न्यूनतम मजदूरी की दर बढ़ाने) के लिए लॉबिंग करते हैं, ताकि छोटे व्यावसायिक प्रतिष्ठान इस बढ़े भार को सहन न कर सकें और समाप्त हो जाएं.. इस प्रकार, बड़े प्रतिष्ठानों के राह से प्रतिस्पर्धा समाप्त हो जाती है..
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भारत में शिक्षा के लिए संसाधन जुटाने की तमाम कोशिशें हो रही हैं। शिक्षा उपकर से लेकर न जाने क्या-क्या? पर हकीकत ये है कि सरकार जो पैसे खर्च करती हैं, उसका भारी दुरुपयोग होता है। क्यों न शिक्षा के लिए आवंटित पैसे सीधे-सीधे छात्रों को वाउचर के रूप में दे दिया जाए - पेश है इस पर एक पड़ताल।

अर्थशास्त्र में यह माना जाता है कि सभी मनुष्य तार्किक होते हैं अर्थात् वे हानि की अपेक्षा लाभ पसन्द करते हैं तथा तार्किक रूप से स्व-हित के लिए प्रयासरत रहते हैं। राजनीति विज्ञान में अधिकाँशतः गलत रुप से यह माना जाता है कि राजनैतिक बाज़ार के सभी अभिनेता अर्थात् राजनेता एवं नौकरशाह, निस्वार्थ भाव से जनहित के लिए प्रयासरत रहते हैं।

जन्मदिन विशेषः "सही लोगों का चयन करना अच्छी बात है, लेकिन समस्याओं का समाधान इतने से ही नहीं होता। समस्याओं का समाधान गलत व्यक्ति के लिए सही कार्य करने को राजनैतिक ढंग से लाभकारी बनाने से होता है..: मिल्टन फ्रीडमैन"

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जिस "स्वस्थ्य सरकारी नीति के सात सिद्धांतों'' की हम यहाँ चर्चा करने जा रहे हैं, वे मुक्त अर्थव्यवस्था के आधार स्तंभ हैं। उनमें से प्रत्येक किसी विशेष मुद्दे पर किस तरह लागू होता है, इस संबंध में हमारी राय अलग-अलग हो सकती है, पर ये सिद्धांत अपने आप में स्थापित सत्य हैं। इन्हें मैंने नहीं बनाया है। बल्कि मैंने इन्हें सिर्फ एक जगह इकट्ठा किया है। ऐसा नहीं है कि मुक्त अर्थ व्यवस्था के आधार स्तंभ सिर्फ ये ही हैं या सिर्फ यही सत्य है, लेकिन ये एक संतुलित और सम्यक विचार जरूर प्रस्तुत करते हैं। मेरा विश्वास है कि सरकार की प्रत्येक संरचना में बैठे लोग

जब हम जैसे लोग यह कहते हैं कि - जनसंख्या समष्द्धि का कारण है, केवल मनुष्य ही ऐसी प्रजाति है जो धन पैदा कर सकती है और नक्शे पर  अंकित प्रत्येक बिन्दु,  जनसंख्या की दृष्टि से सघन है और ज्यादा सम्पन्न है,  तो उनके जैसे (तथाकथित समाजवादी) लोग प्राकृतिक संसाधन की कमी की बात करते हैं। उनका तर्क है कि पृथ्वी पर संसाधन सीमित हैं तथा यदि ज्यादा लोग होंगे, तो ये जल्दी समाप्त हो जायेंगे। प्राकृतिक संसाधनों की कमी की समस्या का जूलियन साइमन ने गहनतापूर्वक अध्ययन किया। उसने दीर्घकालिक मूल्य सम्बन्धी प्रवृत्तियों का अध्ययन किया और इससे बड़े रो

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