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इस वीडियो के माध्यम से डा. टॉम जी. पामर उस साम्यवादी (कम्युनिस्ट) मान्यता का जवाब दे रहे हैं जिसके मुताबिक मुनाफ़ा कमाना अनैतिक काम है और उद्यमियों के द्वारा मुनाफ़ा मजदूरों का शोषण कर हासिल किया जाता है। डा. पामर उस मान्यता का भी खंडन करते हैं जिसके तहत मुनाफा अर्जित करने वाले लोगों से उम्मीद की जाती है कि वे अपने मुनाफे को समाज को लौटा देंगे..

'यूनाइटेड नेशंस एजुकेशनल, साइंटिफिक एंड कल्चरल ऑर्गनाइज़ेशन' (यूनेस्को) ने हाल ही में वर्ष 2017-18 के लिए 'द ग्लोबल एजुकेशन मॉनिटरिंग (जीईएम) रिपोर्ट' को जारी किया है। रिपोर्ट में दुनियाभर में स्कूली शिक्षा के हालात पर प्रकाश डाला गया है। लेकिन यूनेस्को की रिपोर्ट, भारत में स्कूली शिक्षा को लेकर कुछ ज्यादा ही चिंतित नजर आ रही है। रिपोर्ट का नाम 'अकाउंटेबिलिटी इन एजुकेशन' भी भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप ज्यादा प्रतीत होता है। यूनेस्को द्वारा जारी रिपोर्ट में भारत सहित अन्य देशों में स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में अकाउंटेबिलिटी अर्थात जवाबदेही क

व्यक्तित्व एवं कृतित्व

[जन्म 10 दिसंबर, 1878  – निधन 25 दिसंबर, 1972]

राजाजी पर प्रायः अंसगत और बार-बार अपना पक्ष बदलते रहने का आरोप लगता रहा है। हम कुछ ऐसी महत्वपूर्ण परिस्थितियों का अवलोकन कर सकते हैं, जब उनका विरोधाभास स्पष्ट रूप से दिखाई दियाः

“माल-ए-मुफ्त, दिल–ए-बेरहम, फिर क्या तुम, क्या हम?” हमारी एक आदत सी हो गई है। हम हर चीज की अपेक्षा सरकार या सरकारी व्य वस्था  से करते हैं। यह ठीक है कि हमारे दैनिक जीवन में सरकार का दखल बहुत अधिक है बावजूद इसके हम उस पर कुछ ज्य़ादा ही निर्भर हो जाते हैं। एक कहावत है कि किसी समाज को पंगु बनाना है तो उसे कर्ज या फिर सब्सिडी की आदत डाल दो, वो इससे आगे कभी सोच ही नहीं पाएगा। देश की राजनीति में ये कथन बहुत मौजूं है।  

Author: 
नवीन पाल

किसी व्यक्ति के सशक्त होने का व्यवहारिक मानदंड क्या है? इस सवाल के जवाब में व्यवहारिकता के सर्वाधिक करीब उत्तर नजर आता है- आर्थिक सक्षमता। व्यक्ति आर्थिक तौर पर जितना सम्पन्न होता है, समाज के बीच उतने ही सशक्त रूप में आत्मविश्वास के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। निश्चित तौर पर आर्थिक मजबूती के लिए अर्थ को अर्जित करना ही पड़ता है। भारतीय अर्थ परम्परा में धर्म और अर्थ को परस्पर पूरक तत्व के रूप में प्रस्तुत करते हुए महर्षि चाणक्य ने भी कहा है- धर्मस्य मूलम अर्थम्। यानी, धर्म के मूल में अर्थ अनिवार्य तत्व है।

Author: 
शिवानंद दिवेदी

अमेरिकी अर्थशास्त्री थॉमस सॉवेल के अनुसार, देश में आम चुनावों के लिए मतदान इनकम टैक्स जमा करने की अंतिम तिथि (अमेरिका के संदर्भ में 15 अप्रैल) के दूसरे दिन कराना चाहिए। यह उन गिने चुने तरीकों में से एक होगा जो सरकारों को अत्यधिक खर्चीला होने के प्रति हतोत्साहित करेगा..

एक खबरः भारत में व्यापार करना हुआ आसान बीबीसी हिंदी द्वारा इस मुद्दे पर प्रकाशित कार्टून असंगठित क्षेत्र के व्यवसायियों के साथ जारी ज्यादतियों को बेहद ही प्रभावी ढंग से व्याख्या करता है.. साभारः बीबीसी हिंदी
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निजी स्कूलों की मनमानी फीस बढ़ोत्तरी और उस पर उत्तर प्रदेश की योगी सरकार की तरफ से की जा रही कार्रवाई इन दिनों चर्चा में है। बेशक निजी स्कूलों को मनमाने ढंग से फीस में बढ़ोत्तरी को अनुमति नहीं दी जा सकती। लेकिन फीस बढ़ोतरी नियंत्रित कैसे हो इसके तरीके अलग अलग हो सकते  हैं। निजी स्कूलों के फीस नियंत्रण पर चर्चा करने से पहले एक अहम सवाल यह है कि छठवें और सातवें वेतन आयोग के बाद अध्यापकों के वेतन में जो बढ़ोत्तरी हुई है, क्या उसी अनुपात में सरकारी स्कूलों की शिक्षा का स्तर भी बढ़ा है?

19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में पश्चिमी यूरोप में आर्थिक विचारों के दो विरोधी संप्रदायों- जर्मन ऐतिहासिक संप्रदाय और ऑस्ट्रियन संप्रदाय का जन्म हुआ। जर्मन ऐतिहासिक संप्रदाय ने आर्थिक इतिहास की सहायता से आर्थिक सच्चाई को जानने का प्रयास किया। प्रारंभिक ऑस्ट्रियन विचारकों ने 1883 में जर्मन संप्रदाय द्वारा विकसित अनुभवाश्रित पद्धति को अपनी आलोचना का केंद्र बनाया। इनका मत था कि आर्थिक ज्ञान इतिहास के अध्ययन से नहीं बल्कि सैद्धांतिक विश्लेषण से उत्पन्न होता है। पद्धति को लेकर उत्पन्न हुआ विवाद दो दशकों से अधिक समय तक बना रहा। ऑस्ट्रियन संप्रदाय के

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