व्यापार

व्यवसाय में सरकारी "सहायता" उतना ही त्रासदीपूर्ण है जितना कि सरकारी "उत्पीड़न"...सरकार केवल एक ही तरीके से राष्ट्र की समृद्धि में अपना योगदान दे सकती है, और वह है स्वयं को इससे दूर रखना।
 
- आयन रैंड

हाल में हुए विधानसभा चुनाव में आम आदमी महंगाई की ही शिकायत कर रहा था। टीवी पर लोग आलू, प्याज, घी और दाल की कीमतें बताते नजर आते थे। हालांकि चुनावी पंडित हमेशा का चुनाव राग ही गा रहे थे, लेकिन कांग्रेस की हार में भ्रष्टाचार से ज्यादा महंगाई का हाथ रहा। हाल में महंगाई कुछ कम हुई हैं, लेकिन सभी दलों के लिए यह चेतावनी है कि आम आदमी महंगाई के दंश को भूलने वाला नहीं है और यह आगामी आम चुनाव में नजर आएगा।

Author: 
गुरचरण दास

देश का औद्योगिक परिदृश्य बेहद निराशाजनक है। नवंबर, 2013 के औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) के आंकड़े 2008-09 में आई वैश्विक मंदी जैसे चिंताजनक स्तर पर पहुंच गए हैं। ऐसे में, मौजूदा वित्त वर्ष के औद्योगिक उत्पादन में बहुत मजबूती की उम्मीद नहीं की जा सकती है। पिछले छह महीनों में खासकर महंगे उपभोक्ता सामान का उत्पादन घट जाने के चलते ही ऐसी स्थिति देखने को मिली है। अंतरराष्ट्रीय वित्त निगम द्वारा जारी नई विश्व कारोबारी परिदृश्य रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में कारोबार शुरू करने के लिए 12 प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है, जबकि दक्षिण एशियाई देशो

एक दूसरे के पड़ोसी होते हुए भी भारत और पाकिस्तान के बीच कारोबार काफी सिमटा रहा है। कुछ समय पहले तक दक्षिण एशिया में श्रीलंका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार था, अवामी लीग सरकार के कार्यकाल में अब बांग्लादेश उससे थोड़ा आगे निकल गया है। पाकिस्तान इन दोनों से पीछे है। इसकी वजह भारत से उसके रिश्तों में आते रहे उतार-चढ़ाव के अलावा कारोबार के लिए ढांचागत सुविधाओं की कमी भी है। दोनों के बीच बहुत सारा व्यापारिक लेन-देन तीसरे देश के जरिए होता रहा है, जो कि दोनों के हित में नहीं है। देर से ही सही, अब आपसी व्यापार की संभावनाएं बढ़ाने की कोशिश चल रही है।

देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले रेहड़ी पटरी व्यवसायी और फेरीवाले समाज में हमेशा से हाशिए पर रहे हैं। शासन और प्रशासन द्वारा हमेशा से उन्हें शहर की समस्या में ईजाफा करने वाले और लॉ एंड आर्डर के लिए खतरा माना जाता रहा है। हालांकि सेंटर फॉर सिविल सोसायटी (सीसीएस), नासवी व सेवा जैसे गैर सरकारी संगठन देशव्यापी अभियान चलाकर छोटे दुकानदारों और फेरीवालों की समस्याओं को दूर करने के लिए उचित संवैधानिक उपाय की लंबे समय से मांग करते रहे हैं। इस दिशा में सकारात्मक कदम उठाते हुए पिछले दिनों लोकसभा से प्रोटेक्शन ऑफ लाइवलीहुड एंड रेग्यु

नए वर्ष में देश के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की है। घटती आर्थिक विकास दर, बढ़ता राजकोषीय और चालू खाते का घाटा, लगातार चिंता का कारण बना हुआ है। यही नहीं, पिछले दिनों खुदरा मुद्रास्फीति की दर 14 महीने के उच्चतम स्तर तक पहुंच गई। अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियां ने भी आगाह किया है कि यदि समय रहते आर्थिक निर्णय नहीं लिए गए तो भारत की साख और गिर सकती है।

पिछले तीन वर्षों से हमारी अर्थव्यवस्था संकट में है। विकास दर लगातार गिर रही है, महंगाई बढ़ती जा रही है और रुपया टूट रहा है। इन सभी समस्याओं की जड़ में कुशासन ही दिखाई देता है। महंगाई बढ़ने का कारण है सरकार द्वारा अपने राजस्व का लीकेज किया जाना। जैसे सरकार का राजस्व एक करोड़ रुपया हो और उसमें 20 लाख रुपये का रिसाव करके अफसरों और नेताओं ने सोना खरीद लिया हो। अब सरकार के पास वेतन आदि देने के लिए रकम नहीं बची। ये खर्चे पूरे करने के लिए सरकार ने बाजार से कर्ज लिए।

वर्ष 2014 में भारत के समक्ष जो सबसे बड़ी संभावना और चुनौती होगी, वह आर्थिक विकास की उच्च दर को वापस लौटाने की होगी, जैसा कि कुछ वर्ष पहले था। यह केवल उच्च विकास ही है जो हमारे देश की सतत समृद्धि को सुनिश्चित करेगी। 2014 के आम चुनावों में हमें अवश्य ही एक ऐसे उम्मीदवार और पार्टी के पक्ष में मतदान करना चाहिए जो विकास को वापस पटरी पर लौटा सके।

Author: 
गुरचरण दास

अगर आप जमीन की तरफ ही देखते रहें तो आपको इंद्रधनुष कभी नहीं दिखेगा। भारतीय वित्तीय बाजार अब चार्ली चैपलिन के इस सूत्र को मंत्र की तरह जप रहा है। पिछले तीन सालों में यह पहला वर्षात है जब भारत के बाजार यंत्रणाएं भूलकर एकमुश्त उम्मीदों के साथ नए साल की तरफ बढ़ रहे हैं। सियासी अस्थिरता और ऊंची ब्याज दरों के बीच बल्लियों उछलते शेयर बाजार की यह सांता क्लाजी मुद्रा अटपटी भले ही हो, लेकिन बाजारों के ताजा जोशो खरोश की पड़ताल आश्वस्त करती है कि किंतु-परंतु के बावजूद उम्मीदों का यह सूचकांक आर्थिक-राजनीतिक बदलाव के कुछ ठोस तथ्यों पर आधारित है।