व्यापार

वोक्स यू (VoxEU) में जीसस फेलिप, उत्सव कुमार और आर्नेलिन एबडन का एक आकर्षक लेख प्रकाशित हुआ है, ‘चीन और भारतः सबसे अलग दो धुरंधर’ (china and India: Those two big outliers)। इस लेख में वे इस रोचक तथ्य का जिक्र करते हैं कि जब बात निर्यात को व्यावहारिक बनाकर परिष्कृत करने, उसमें विविधता लाने की आती है तो भारत और चीन उनके सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के लिहाज से काफी समझदार दिखते हैं। निर्यात में विविधता का जो सबूत वे पेश करते हैं, वह काफी चौंकाने वाला है-

पिछले 10-15 सालों में भारत में आउटसोर्सिंग उद्योग ने बहुत प्रगति की है. आउटसोर्सिंग से ना सिर्फ लाखो लोगो को रोज़गार मिला, देश की GDP (सकल घरेलू उत्पाद) को भी इसकी वजह से एक बड़ा उछाल मिला. विश्व के बड़े और विकसित देश आज भारत सरीखे कई अन्य विकाशील देशों से अपने काम सस्ती दरों पर कराते हैं. सस्ती जगहों में अपना काम आउटसोर्स करने के कई फायदे हैं. अव्वल तो इन देशों को कम दरों पर काम करने वाले पर काबिल कर्मचारी मिल जाते हैं. खासतौर पर भारत में काम करने लायक युवा जनता ना सिर्फ अच्छी अंगेजी बोलना जानती है, वो कंप्यूटर का भी ज्ञान रखती है.

 

व्यापार से शांति होती है. जो देश आपस में व्यापार करते हैं, उन में युद्ध की जगह शांति और मित्रता का सम्बन्ध रहता है. देशों के बीच में जितना अधिक व्यापार होगा, उन में संघर्ष की सम्भावना उतनी कम रहेगी. ये समझना गलत है की आपसी व्यापार से सिर्फ एक पक्ष का ही फायदा होता है. मुक्त व्यापार से आपसी लाभ होते हैं और समाज में शांति और सम्पन्नता को बढ़ावा मिलता है.

 

एप्पल कोर होटल्स के सी ई ओ विजय दंडपानी का कहना है की मुक्त व्यापार ना होने से देशों के बीच में सिर्फ द्वेष की भावना बढती है. भारत पाकिस्तान आपसी व्यापार के ज़रिये एक दूसरे का काफी आर्थिक फायदा कर सकते थे और यदि ऐसा होता तो दोनों पड़ोसी मुल्कों में इतनी शत्रुता भी नहीं होती. उन्होने अमरीका और कनाडा का भी उदाहरण दिया जो मुक्त व्यापर के ज़रिये आज एक बहुत अछे सम्बन्ध में बंधे हुए हैं.

एक सदी से ज्यादा वक्त हो गया अर्थशास्त्री आदर्श मुद्रा को बनाने या उसे ईजाद करने में जुटे हुए हैं। ऐसी मुद्रा के विस्तृत स्वभाव को लेकर किन्हीं दो अर्थशास्त्रियों तक में सहमति दिखाई नहीं देती। लेकिन फिलहाल वे इसके एक नकारात्मक बिंदु पर तो सहमत दिखाई देते हैं। मुझे शक ही है कि शायद ही कोई अर्थशास्त्री होगा जो अंतरराष्ट्रीय या अमेरिकी मुद्रा प्रणाली का आज की स्थिति में बचाव करना चाहेगा।

    राष्ट्रीय मीडिया में सुर्खियों में छाया रहा होंडा मोटरसाइकिल्स एंड स्कूटर्स इंडिया लि.

    'उद्यमी' शब्द सुनते ही अचानक टाटा, बिरला, अंबानी, नारायण मूर्ति आदि का स्मरण हो आता है। लेकिन एक सामान्य आदमी भी किसी-न-किसी रूप में कोई-न-कोई उद्यम करता है। महावत, लोहार, रेहड़ी-पटरी वाले, मदारी, सपेरे, मछुआरे, चिड़ीमार, मजदूर, कूड़ा चुनने वाले इत्यादि कड़ी मेहनत कर अपनी जीविका चलाते हैं। तो क्या वे भी उद्यमी नहीं हुए? यह अलग बात है कि कानून, रेगुलेशन और रीति-रिवाज बहुधा उनके सामने कई बाधाएँ खड़ी करती रहती हैं।

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