व्यापार

एक सदी से ज्यादा वक्त हो गया अर्थशास्त्री आदर्श मुद्रा को बनाने या उसे ईजाद करने में जुटे हुए हैं। ऐसी मुद्रा के विस्तृत स्वभाव को लेकर किन्हीं दो अर्थशास्त्रियों तक में सहमति दिखाई नहीं देती। लेकिन फिलहाल वे इसके एक नकारात्मक बिंदु पर तो सहमत दिखाई देते हैं। मुझे शक ही है कि शायद ही कोई अर्थशास्त्री होगा जो अंतरराष्ट्रीय या अमेरिकी मुद्रा प्रणाली का आज की स्थिति में बचाव करना चाहेगा।

    राष्ट्रीय मीडिया में सुर्खियों में छाया रहा होंडा मोटरसाइकिल्स एंड स्कूटर्स इंडिया लि.

    'उद्यमी' शब्द सुनते ही अचानक टाटा, बिरला, अंबानी, नारायण मूर्ति आदि का स्मरण हो आता है। लेकिन एक सामान्य आदमी भी किसी-न-किसी रूप में कोई-न-कोई उद्यम करता है। महावत, लोहार, रेहड़ी-पटरी वाले, मदारी, सपेरे, मछुआरे, चिड़ीमार, मजदूर, कूड़ा चुनने वाले इत्यादि कड़ी मेहनत कर अपनी जीविका चलाते हैं। तो क्या वे भी उद्यमी नहीं हुए? यह अलग बात है कि कानून, रेगुलेशन और रीति-रिवाज बहुधा उनके सामने कई बाधाएँ खड़ी करती रहती हैं।

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