गुणवत्ता

शिक्षा के क्षेत्र में हमें गुणवत्ता पर केन्द्रित रहना चाहिये और यह सुनिश्चित करना चाहिये कि दाखिला प्राप्त करने वाला प्रत्येक विद्यार्थी सीखने के लक्ष्य की सबसे सीधी राह को पा सकें।

किसी मेहमान के लिए मेज़बान के मूंह पर इतनी बड़ी बात और वह भी बेबाकी से कहने की घटना बिरले ही सुनने में आती है जैसा कि भारत के मेहमान सिंगापुर के डिप्युटी प्राइम मिनिस्टर थर्मन शन्मुगरत्नम ने हमारे देश में भरी सभा में कह दी। दिल्ली के विज्ञान भवन में बोलते हुए उन्होंने कहा कि ‘‘भारत में स्कूलों की भारी कमी है" और "यह वह कमी है जिसे उचित नहीं ठहराया जा सकता है।" बेशक, मेहमान ने कोई नई बात नहीं कही पर जिस संदर्भ में यह बात कही गई वह गौरतलब है। उनका कहना है, ‘‘भारत और ईस्ट एशिया के देशों में सबसे बड़ा अंतर’ ख़ास्ताहाल शिक्षा का है। भारत की मौजूदा शिक

एक महत्वपूर्ण सवाल: क्या आर्थिक स्वतंत्रता से सचमुच लोगों के जीवन स्तर में कोई सुधार आता है? श्रीलंका में आर्थिक स्वतंत्रता ज्यादा है। यहां आर्थिक और सामाजिक माहौल भी अन्य दक्षिण एशियाई देशों की तुलना में बेहतर है। फ्रेजर तालिका में आर्थिक मायने में ज्यादा मुक्त देशों और कम मुक्त देशों की आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों में आश्चर्यजनक अंतर देखने को मिलता है।
 

यदि मनुष्य की नैसर्गिक प्रवृत्ति (स्वभाव) इतनी बुरी है कि उसे आजाद छोड़ना सुरक्षित नहीं तो ऐसी सोच रखने वाले या ऐसी व्यवस्था करने वालों की प्रवृत्ति हमेशा सही ही कैसे हो सकती है? क्या विधायिका (सरकार) में शामिल और उनके द्वारा नियुक्त लोग मानव जाति से संबंध नहीं रखते हैं? या फिर उन्हें लगता है कि अन्य लोगों की तुलना में वे उच्च कोटि (गुणवत्ता) की मिट्टी से बने हुए हैं???

- फ्रेडरिक बास्तियात

 

चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है, लेकिन उसके साथ भारत का 29 अरब डॉलर का विशाल व्यापार घाटा भी है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने चीनी जोड़ीदार ली ख छ्यांग से हाल की मुलाकात में कहा कि इस घाटे का 'कुछ किया जाना चाहिए।' लेकिन एक अर्थशास्त्री के रूप में वे अवश्य ही यह जानते हैं कि हर व्यापारिक भागीदार के साथ व्यापार घाटे को संतुलित करने की सोच गलत है।

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर