विश्वास

यद्यपि सन् 1991 से भारत में आर्थिक सुधारों की शुभारंभ और मुक्त बाजार के साथ भारतीयों के प्रेम प्रसंग को शुरू हुए दो दशक बीत चुके हैं, इसके बावजूद पूंजीवाद को भारत में अपना मुकाम पाने के लिए अबतक जद्दोजहद करना पड़ रहा है। अधिकांश लोगों की भांति भारतीय भी मानते हैं कि बाजार फलदायक तो है लेकिन नैतिक नहीं है। लेकिन मेरी राय इसके बिल्कुल उलट है। मेरा मानना है कि इंसान अनैतिक होता है और लोकतंत्र के तहत या राजतंत्र के तहत, समाजवादी व्यवस्था हो अथवा पूंजीवादी समाज बुरा व्यवहार वही करता है। बाजार नामक संस्था अपने आप में अत्यंत नैतिक होती है, और

हाल ही में वित्तमंत्री पी. चिदंबरम थकाऊ विदेश दौरे से वापस लौटे हैं, जहां उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था की सुनहरी तस्वीर पेश करते हुए मौजूदा और संभावित निवेशकों को भारत के प्रति लुभाते हुए कहा कि भारत व्यापार के लिए आकर्षक गंतव्य है। उन्होंने रेटिंग एजेंसियों को भी लुभाने का प्रयास किया कि कहीं वे भारत की रेटिंग न गिरा दें। वह अपने मकसद में कितने कामयाब हुए यह तो आने वाले महीनों में ही पता चलेगा जब उनके मंत्रालय को अगले आम चुनाव की तैयारियों के तहत लोकप्रिय राजनीति का बोझ उठाना पड़ेगा।