व्यापार

- तमाम व्यवहारिक दिक्कतों के बावजूद बाजार द्वारा देश में कैशलेस इकोनॉमी की ठोस नींव रखी जा चुकी है। अब आवश्यकता है कि सरकार उस नींव के सहारे अपने बहु-उद्देशीय और महत्वकांक्षी योजना वाले भवन का निर्माण करे।

प्राचीन काल से ही भारत व्यापार एवं व्यवसाय को प्राथमिक स्तर की वरीयता देने वाला देश रहा है। चाणक्य की अर्थनीति में भी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की अवधारणा में भी अर्थ को प्रथम वरीयता पर रखा गया है। ऋग्वेद में भारत को कृषि एवं पशुधन आधारित अर्थव्यवस्था के रूप में प्रस्तुत किया गया है। मध्य-युगीन भारतीय इतिहास को देखें तो वहां भी भारत की स्थिति व्यापार एवं व्यवसाय के अनुकूल नजर आती है। चूँकि इस दौरान अरब व्यापारियों का भारत में व्यापार के लिए आगमन हो चुका था और यूरोप के लोग भी समुद्री मार्ग से भारत आने का रास्ता खोजने लगे थे। ईस्ट इंडिया कंपनी भ

प्राइवेट स्कूलों द्वारा फीस में की जा रही मनमानी वृद्धि को लेकर पैरंट्स मे खासा आक्रोश है। हर नए साल में 30-40 प्रतिशत फीस बढ़ाना सामान्य बात हो गई है। पैरंट्स की मांग है कि सरकार स्कूल मालिकों की इस मनमानी पर अंकुश लगाए। उनकी मांग सही है। शिक्षा को पूरी तरह बाजार पर नहीं छोड़ा जा सकता। लेकिन, सरकारी दखल की अलग समस्याएं है। पूरे देश में सरकारी स्कूलों की बदहाली बताती है कि सरकारी दखल से प्राइवेट स्कूलों का भी यही हाल हो जाएगा।

प्रधानमंत्री मोदी जी द्वारा 500 और 1000 के नोट समाप्त करने के फैसले से पहले मैं भी अचंभित हुआ और आनंदित भी। पर कुछ समय तक गहराई से सोचने के बाद सारा उत्साह समाप्त हो गया। नोट समाप्त करने और फिर बाजार में नए बड़े नोट लाने से अधिकतम 3% काला धन ही बाहर आ पायेगा, और मोदी जी का दोनों कामों का निर्णय कोई दूरगामी परिणाम नहीं ला पायेगा, केवल एक और चुनावी जुमला बन कर रह जाएगा। नोटों को इसप्रकार समाप्त करना- 'खोदा पहाड़ ,निकली चुहिया " सिद्ध होगा। समझने की कोशिश करते हैं।

यद्यपि सन् 1991 से भारत में आर्थिक सुधारों की शुभारंभ और मुक्त बाजार के साथ भारतीयों के प्रेम प्रसंग को शुरू हुए दो दशक बीत चुके हैं, इसके बावजूद पूंजीवाद को भारत में अपना मुकाम पाने के लिए अबतक जद्दोजहद करना पड़ रहा है। अधिकांश लोगों की भांति भारतीय भी मानते हैं कि बाजार फलदायक तो है लेकिन नैतिक नहीं है। लेकिन मेरी राय इसके बिल्कुल उलट है। मेरा मानना है कि इंसान अनैतिक होता है और लोकतंत्र के तहत या राजतंत्र के तहत, समाजवादी व्यवस्था हो अथवा पूंजीवादी समाज बुरा व्यवहार वही करता है। बाजार नामक संस्था अपने आप में अत्यंत नैतिक होती है, और

भारत में बड़े धूमधाम के साथ मनाया जाने वाले दीपावली के त्यौहार को मनाने के मुख्यतः दो कारण हैं। पहला कारण, पौराणिक मान्यताओं के अनुसार लंकापति रावण का संहार कर अयोध्या के राजा राम, भाई लक्ष्मण व पत्नी सीता के साथ अपने राज्य वापस लौटे थे। पुष्पक विमान से रात के अंधेरे में अयोध्या पहुंचे राम के स्वागत के लिए अयोध्यावासियों ने घर के बाहर दिए जलाए और रौशनी कर विमान को यथास्थान उतरने की राह दिखाई। कालांतर में यह उस घटना को याद करने और खुशी मनाने की परंपरा के तौर पर प्रचलित हुआ। दूसरा कारण, धन, सुख और समृद्धि की देवी लक्ष्मी की पूजा अर्चना कर धनार्

एक अप्रैल 2010 को ‘शिक्षा का अधिकार’ क़ानून 86वें संशोधन के तहत लागू किया गया था। इस क़ानून को लागू करने के पीछे मुख्य उद्देश्य यही था कि छह वर्ष से चौदह वर्ष तक के बच्चों की मुफ्त शिक्षा को सुनिश्चित किया जाये। इस क़ानून से शिक्षा प्राप्त करना न सिर्फ हर बच्चे का अधिकार बना बल्कि सरकार की भी जवाबदेही तय हो गयी।

पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों ने प्रकृति और संस्कृति, कला और जीवन, सामरिक ललक, भावनात्मक एवं आध्यात्मिक शांति, जैव एवं सांस्कृतिक विविधता के बीच एक बेमिसाल तालमेल स्थापित किया है और इसे संरक्षित भी किया है। इन लोगों ने इस संतुलन की खूबी को संगीत, कला, स्थापत्य, अपनी सोच और ज्ञान प्रणाली, जीवन के आधारभूत रीति रिवाज से लेकर अपने कार्यों, मौसम और प्रकृति में संजोये रखा है।

- फ्रेजर इंस्टिट्यूट व सेंटर फॉर सिविल सोसायटी द्वारा जारी वैश्विक रैंकिंग में 102 से फिसलकर 112वें स्थान पर पहुंचा भारत
- आर्थिक स्वतंत्रता के मामले में भूटान (78), नेपाल (108) व श्रीलंका (111) से पिछड़ा पर चीन (113), बांग्लादेश (121) व पाकिस्तान (133) से रहा आगे
- आर्थिक रूप से स्वतंत्र देशों की सूची में हांगकांग शीर्ष पर, सिंगापुर व न्यूजीलैंड क्रमशः दूसरे और तीसरे पायदान पर

अर्थशास्त्र में यह माना जाता है कि सभी मनुष्य तार्किक होते हैं अर्थात् वे हानि की अपेक्षा लाभ पसन्द करते हैं तथा तार्किक रूप से स्व-हित के लिए प्रयासरत रहते हैं। राजनीति विज्ञान में अधिकाँशतः गलत रुप से यह माना जाता है कि राजनैतिक बाज़ार के सभी अभिनेता अर्थात् राजनेता एवं नौकरशाह, निस्वार्थ भाव से जनहित के लिए प्रयासरत रहते हैं।

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