खुला बाजार

किसी भी शब्द को लेकर समाज में एक ख़ास किस्म की सकारात्मक अथवा नकारात्मक अवधारणा का बन जाना कोई नई बात नही है. 'बाजार' अर्थात 'मार्केट' शब्द  भी इससे अछूता  नही  है। आमतौर  पर  यदि  आप  किसी भी व्यक्ति से  एक सवाल पूछें कि क्या देश में  बाजार के लिए आजाद एवं उदार माहौल होना चाहिए ? अथवा क्या बाजार पर बंदिशों की बजाय छूट का माहौल ज्यादा होना ठीक है ? आपको बहुतायत में जो जवाब मिलेगा वो 'नही' में होगा।

...जोनाथन को पैदल चलते कई घंटे हो चुके थे लेकिन दूर-दूर तक ऐसा कुछ नजर नहीं आ रहा था जिससे पता चल सके कि आसपास किसी तरह का जीवन भी है। अचानक पास की झाड़ी में कुछ हिलने की आहट हुई। पीली धारीदार पूंछवाला एक छोटा सा जानवर झाड़ियों के बीच मुश्किल से नजर आ रह रास्ते से नीचे की ओर भागा। शायद एक बिल्ली थी। जोनाथन ने सोचा, क्या पता यही मुझे किसी बस्ती तक पहुंचा दे। जोनाथन ने घनी झाड़ियों के बीच कूद लगा दी।