शासन

जिस "स्वस्थ्य सरकारी नीति के सात सिद्धांतों'' की हम यहाँ चर्चा करने जा रहे हैं, वे मुक्त अर्थव्यवस्था के आधार स्तंभ हैं। उनमें से प्रत्येक किसी विशेष मुद्दे पर किस तरह लागू होता है, इस संबंध में हमारी राय अलग-अलग हो सकती है, पर ये सिद्धांत अपने आप में स्थापित सत्य हैं। इन्हें मैंने नहीं बनाया है। बल्कि मैंने इन्हें सिर्फ एक जगह इकट्ठा किया है। ऐसा नहीं है कि मुक्त अर्थ व्यवस्था के आधार स्तंभ सिर्फ ये ही हैं या सिर्फ यही सत्य है, लेकिन ये एक संतुलित और सम्यक विचार जरूर प्रस्तुत करते हैं। मेरा विश्वास है कि सरकार की प्रत्येक संरचना में बैठे लोग

हम में से जो लोग बड़े शहरों में रहते हैं, वे अपने शहर को इतना चाहते हैं कि शायद ही कभी उसके भीतर झांककर देखते हैं कि जिस शहर में हम रह रहे हैं, उसमें चल क्या रहा है। इतना ही नहीं हमारे पास इतना वक्त ही नहीं होता कि थोड़ा आराम से बैठकर इस बारे में कुछ सोचें। शहरों में रहने वाले हम लोग हमेशा रोजमर्रा की जिंदगी के रोलर-कोस्टर पर होते हैं। आइए, इस लेख को पढ़ने के लिए लगने वाले वक्त में ही अपने शहर पर कुछ निगाह दौड़ा ली जाए। मैं आपको फुर्ती से एक विचार-यात्रा पर ले चलता हूं।
 
मुझे नहीं लगता कि यह कहना अतिश्योक्ति होगा कि हमारा इतिहास, महंगाई और मुद्रा स्फीति का इतिहास रहा है। वह मुद्रा स्फीति जिसका सृजन आम तौर पर सरकार द्वारा सरकार के फायदे के लिए किया गया..
 
- फ्रैडरिक ऑगस्ट वॉन हायक  

इसमें कोई शक नहीं कि आम आदमी पार्टी के आने से भारतीय राजनीति में उम्मीद जग गई है नए सिरे से राजनीतिक सवालों को देखने की। भ्रष्टाचार, परिवारवाद और झूठे वायदों ने राजनीतिक माहौल में जो निराशा फैलाई है देश भर में, वह थोड़ी कम हुई है। आप के नेता यह जानते हैं, सो हर तरह से दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि वे अन्य राजनेताओं जैसे नहीं हैं। मतगणना के दिन आप के बड़े नेता अपने कार्यकर्ताओं के साथ जमीन पर बैठकर नतीजों का इंतजार करते दिखे। इस बात की खूब तारीफ की टीवी के पंडितों ने। जीत का जश्न मनाया आप ने जंतर-मंतर पर आम कार्यकर्ताओं और समर्थकों के साथ। यह

पिछले कुछ महीनों से देश में एक अजीब-सी मायूसी छा रही थी। महत्वपूर्ण नीतियों में विलंब, भ्रष्टाचार और लोकमत को अनदेखा करने की प्रवृत्ति से निराशा का माहौल बन गया था। लेकिन हताशा के ये बादल अब धीरे-धीरे हटते नजर आ रहे हैं। शुक्रिया उन नागरिकों का जिन्होंने जनहित में लड़ाई लड़ी। इसके अलावा माहौल में परिवर्तन में न्यायालय के निर्णयों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। इन्हीं की बदौलत राजनीतिक सुधारों के नागरिकों के प्रयास आंशिक रूप से ही सही, सफल हो पाए। आखिरकार जनता के दबाव और चुनावी राजनीति की मजबूरियों के कारण सरकार को अंतत: कार्रवाई करनी ही पड़ी।

 

सांप्रदायिक दंगों के मामलों में राजनेताओं सहित सभी दोषियों को दंड मिलने से हिंसा रुकने का रास्ता खुलेगा।

न्याय पाने की उम्मीद भी लुटा चुकेलोगों की सारी नजरें अब कुछ बड़े दिग्गज ‘परीक्षण मामलों’ पर टिकी हैं, जिनमें सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर जैसे वरिष्ठ राजनेता शामिल हैं। लोग मानते हैं कि इन्होंने नरसंहार करने वाली भीड़ का नेतृत्व किया था।

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