नरेगा

दिल्ली में भाजपा की हार के बाद मोदी सरकार राजनीतिक साहस की कमी से जूझ रही है। इसलिए सरकार में यह साहस नहीं रहा कि वह मनरेगा जैसी नाकाम रोजगार योजनाओं को बंद कर सके। भाजपा को डर है कि अगर उसने इस तरह की योजनाओं को बंद किया तो उन्हें गरीब विरोधी करार दे दिया जाएगा।

वर्ष 2014 में भारत के समक्ष जो सबसे बड़ी संभावना और चुनौती होगी, वह आर्थिक विकास की उच्च दर को वापस लौटाने की होगी, जैसा कि कुछ वर्ष पहले था। यह केवल उच्च विकास ही है जो हमारे देश की सतत समृद्धि को सुनिश्चित करेगी। 2014 के आम चुनावों में हमें अवश्य ही एक ऐसे उम्मीदवार और पार्टी के पक्ष में मतदान करना चाहिए जो विकास को वापस पटरी पर लौटा सके।

Author: 
गुरचरण दास

पी चिदंबरम साहब से एक सवाल पूछने का मौका मिलता मुझे, तो मेरा उनसे यह सवाल होता- भारत का कारवां क्यों लुटा? यह सवाल मैंने चुराया है एक मशहूर शेर से, जो कुछ इस तरह है, तू इधर-उधर की न बात कर, यह बता कारवां क्यों लुटा? वित्त मंत्री के लिए यह इसलिए मुनासिब है, क्योंकि वह उस सरकार में मंत्री हैं, जिसके शासनकाल में इतना नुकसान पहुंचाया गया है इस गरीब देश की अर्थव्यवस्था को कि जीडीपी (वार्षिक वृद्धि दर), जो कुछ वर्ष पहले दौड़ रही थी नौ फीसदी की रफ्तार से, पिछले वर्ष गिरकर पांच फीसदी तक पहुंच गई है।

पिछले छह वर्षों में खेत मजदूरों की मजदूरी काफी तेजी से बढ़ी है और इसके बढ़ने की रफ्तार चीजों की कीमतें बढ़ने की रफ्तार से ज्यादा रही है। इसका नतीजा ग्रामीण मजदूरों का जीवन स्तर सुधरने रूप में दिखाई पड़ा है। 2007-08 से लेकर अबतक देश के इस सर्वाधिक विपन्न तबके की आय में 6.8 प्रतिशत की वास्तविक सालाना बढ़त दर्ज की गई है। इस शानदार रुझान के पीछे क्या है?

मनरेगा को लेकर कैग ने जो कुछ कहा है वह वाकई चौंकाने वाला है। कैग की रिपोर्ट के मुताबिक इस स्कीम में 13 हजार करोड़ रूपए की धांधली हुई है और इसका लाभ भी जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच सका है। यूपीए सरकार अपनी उपलब्धियों में इसे सबसे उपर रखती है। कुछ समय पहले कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इसकी जमकर तारीफ की थी और कहा था कि इससे दूसरी हरित क्रांति आ सकती है। जाहिर है, कैग की इस रिपोर्ट से यूपीए सरकार को धक्का लगेगा। वह यह कहकर अपना बचाव करने की कोशिश करेगी कि इस स्कीम को अमल में लाने की वास्तविक जवाबदेही राज्य सरकारों की है, मगर कैग की रिपोर्ट में केंद्र की भी आलोचना

मुक्त बाजार व्यवस्था लोगों के बीच तालमेल और सहयोग को बढ़ावा देती है और उनका जीवन स्तर सुधारने में मदद करती है। दूसरी ओर, अगर अर्थव्यवस्था सरकार के हाथ में है तो यहां हमेशा कुछ ऐसे लोग होंगे जिन्हें सरकार से "खास फायदे" मिलते हैं। जो दूसरे लोगों को लूटते हैं और खुद लुटने से हमेशा बच जाते हैं।

 

- एलन बरिस

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