उत्तर प्रदेश

सभी बच्चोँ को निशुल्क व अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने के लिए लाए गए अधिनियम ‘फ्री एंड कम्पल्सरी एजुकेशन एक्ट-2009’, जिसे आमतौर पर आरटीई एक्ट के नाम से भी जाना जाता है, की खामिया अब स्पष्ट रूप से सामने आने लगी हैं।

‘हिंदी सीखो, हिंदी बोलो, हिंदी अपनाओ’ की भावुकतापूर्ण अपीलें कम नहीं हुई हैं, लेकिन समाज इन अपीलों को कितनी गंभीरता से ले रहा है, इसका अंदाजा स्कूली शिक्षा के ताजा आंकड़ों से हो जाता है। देश भर के स्कूलों से मिले ब्यौरों के आधार पर नेशनल युनिवर्सिटी ऑफ एजुकेशन प्लानिंग एंड एडमिनिस्ट्रेशन के डिस्ट्रिक्ट इन्फॉर्मेंशन सिस्टम फॉर एजुकेशन (DISE) की ओर से जारी इन आंकड़ों के मुताबिक 2008-09 से 2014-15 के बीच हिंदी माध्यम स्कूलों में नामांकन 25 फीसदी बढ़ा है, जबकि इंग्लिश मीडियम स्कूलों का नामांकन इस दौरान बढ़कर दोगुना हो गया है।

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जब भी वापस आती हूं वतन किसी विदेशी दौरे के बाद, तो कुछ दिनों के लिए मेरी नजर विदेशियों की नजरों जैसी हो जाती है। बिल्कुल वैसे, जैसे आमिर खान के नए टीवी इश्तिहार में दर्शाया गया है। मुझे भी जरूरत से ज्यादा दिखने लगती हैं भारत माता के 'सुजलाम, सुफलाम' चेहरे पर गंदगी के मुहांसे, गंदी आदतों की फुंसियां और गलत नीतियों के फोड़े।

तेलंगाना के गठन के फैसले के साथ हमने जो शुरू किया है, वह इतना  खतरनाक है कि यदि इसे अभी नहीं रोका गया तो हम आने वाले वक्त में बहुत पछताएंगे। धमकाकर नया राज्य बनाने के लिए मजबूर करने की कोशिश के नतीजे अच्छे नहीं होंगे।

जब ऐसा कहा गया है कि मानव (Home Economicus) धन पैदा करने के लिए तैयार किया गया एक यंत्र है, तो भारतीय अर्थशास्त्र में बताए जा रहे उस तर्क की जांच करना अत्यंत आवश्यक हो जाता है, जिसके अनुसार भारत की विशाल जनसंख्या गरीबी का एक कारण है। यदि मनुष्य एक मात्र ऐसी प्रजाति है जो धन पैदा कर सकती है, तो इसकी अधिक संख्या गरीबी का कारण कैसे हो सकती है? सच क्या है?