शासन

ओलिवर वेंडेल होम्स ने लिखा है कि कराधान वह मूल्य है जिसे हम अपनी सभ्यता के लिए चुकाते हैं। लेकिन इसे यदि इस तरह से व्यक्त किया जाए कि कराधान हम वास्तव में सभ्यता के अभाव के लिए चुकाते हैं तो ज्यादा उचित होगा। यदि लोग अपनी, अपने परिवार और अपने आस-पास रह रहे जरूरतमंद लोगों की बेहतर देखभाल स्वयं करने लगें तो सरकार खुद-ब-खुद पीछे हट जाएगी

भारत के लोग स्मार्ट और सृजनात्मक होते हैं. उन्होंने यह साबित किया है कि वे परिश्रमी और मितव्ययी होते हैं. भारत की धरती को कई तरह की नेमतें मिली हुई हैं, जिनमें एक अच्छी जलवायु और ढेर सारे प्राकृतिक संसाधन शामिल हैं. इस देश का लोकतंत्र शानदार है जिसकी जड़ें बेहद मजबूत हैं और यहां का शासन कानून-सम्मत है. लेकिन अब सवाल यह है कि आज़ादी के 53 साल बाद भी भारत एक बेहद गरीब देश क्यों है?

Author: 
कँवल रेखी

संपादक:
पार्थ जे शाह
संजय कुमार साह

प्रकाशक:
सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी

 

 

 

 

 

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    यूँ तो अपना मकान हर किसी का सपना होता है। पर अपना मकान होने तक का सफर अधिकतर लोगों को किराये के मकान में रह कर ही तय करना पड़ता है। ऐसे में हर किसी को एक सस्ते मकान की तलाश रहती है। पर आलम यह है कि दिल्ली ही नहीं किसी भी महानगर में आज मकान किराये की दर आसमान छू रही है। परिणाम यह होता है कि अपने मकान का सपना साकार करने का सफर कुछ और ज्यादा लंबा हो जाता है। पर हम लोग यह नहीं सोचते कि आखिर किराया इतना अधिक क्यों है? दूसरे कई सामान की कीमत जब लगातार घटती जा रही है। तो मकानों का किराया ही क्यों बढ़े?

    कई दिनों से पश्चिम बंगाल का सिंगूर और नंदीग्राम राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में छाया रहा। सिंगूर में ममता अनशन पर बैठी रहीं, पर राज्य सरकार को ममता नहीं आई। लेकिन नंदीग्राम में बुद्धदेव जी ने अपनी भूल स्वीकार कर ही ली। वे मान रहे हैं कि वहाँ स्थानीय प्रशासन स्तर पर भारी भूल हुई है। वो भूल क्या थी, स्पष्ट नहीं किया गया। कुछ साफ पता चले तो उसके निहितार्थों पर विचार किया जा सकता है।

    उदारीकरण और निजीकरण का नुस्खा हवाई यात्रा क्षेत्र में थोड़ा सुधार लाने में तो जरूर सफल हुआ है, पर हवाई अड्डा के विकास के दौर में पीछे छूट जाने के कारण न सिर्फ यात्रियों को घोर असुविधाओं का सामना करना पड़ता है, बल्कि यह नागरिक उड्डयन क्षेत्र को भी तेजी से विकास करने से रोक रहा है। देश में हवाई अड्डे का प्रबंधन कितना खराब चल रहा है, उसे राजीव की बातें सुन कर अच्छी तरह समझा जा सकता है। पेश है यहाँ उनका अनुभव उन्हीं की जुबानी।

    दिल्ली सहित देश के 7 राज्यों में सूचना का अधिकार अधिनियम लागू हो चुका है। इस अधिनियम के अनुसार हर नागरिक को यह अधिकार है कि वह सरकार से उसकी किसी भी गतिविधि, प्रावधान, योजना, आदि से संबंधित कोई सूचना मांग सकता है। प्रशासनिक सुधार की दिशा में यह एक अच्छा कदम है। स्वीडन में पिछले 200 सालों से भी अधिक समय (1776 ई­) से यह अधिनियम लागू है और वहाँ भ्रष्टाचार लगभग नहीं के बराबर है।

    नये कानूनों के निर्माण की खातिर संसद में विचार हेतु जिन विधेयकों को लाए जाने की कोशिश की जा रही है, उनमें से एक असंगठित क्षेत्र मजदूर विधेयक भी है। इस विधेयक की रूपरेखा असंगठित मजदूरों को सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से तैयार की गई है। अभी तक मजदूरों के कल्याण के लिए जो कानून अस्तित्व में हैं, वह काफी नहीं है। उनकी परिधि में सामान्यत: संगठित क्षेत्र के मजदूर ही आ पाते हैं, परिणामस्वरूप असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को इसका कोई फायदा नहीं मिल पाता है। दूसरे श्रम आयोग की रिपोर्ट के अनुसार जो भी मजदूर वर्तमान सामाजिक सुरक्षा कानूनों (जैस

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