शासन

‘‘सोवियत संघ के पतन और शीत युद्ध के अंत के बाद बर्लिन की दीवार एकमात्र बाधा नहीं थी जो दूर हुई बल्कि इसके साथ ही धन, व्यापार, लोगों और विचारों के प्रवाह को बाधित करने वालो अवरोधों का भी पतन हो गया।’’

भारत को ऐसे थिंक टैंकों की जरूरत है, जो असरकारी, कम खर्चीले और टिकाऊ नीतिगत समाधानों की खोज कर सके. -पार्थ जे शाह

निजी संपत्ति अधिकार एक व्यक्ति का वो अधिकार है जिससे वह जैसे भी चाहे अपनी संपत्ति का इस्तेमाल कर सकता है, बशर्ते वह दूसरे व्यक्ति के खिलाफ धोखाधड़ी या बल का प्रयोग न करे। संपत्ति अधिकार के महत्व पर जोर देने वाले पहले अर्थशास्त्री आस्ट्रिया के कार्ल मैगर थे। 1971 में एक लेख में मैगर ने यह कहा कि अधिकतर सामान की उपलब्ध मात्रा प्रत्येक व्यक्ति की जरूरतों को पूरा करने के लिए अपर्याप्त है। संभावित रूप से एक उपभोक्ता की रुचि दूसरे प्रत्येक उपभोक्ता से अपर्याप्त सामानों को प्राप्त करने के लिए किए जाने वाले संघर्ष में भिन्न होती है:

ओलिवर वेंडेल होम्स ने लिखा है कि कराधान वह मूल्य है जिसे हम अपनी सभ्यता के लिए चुकाते हैं। लेकिन इसे यदि इस तरह से व्यक्त किया जाए कि कराधान हम वास्तव में सभ्यता के अभाव के लिए चुकाते हैं तो ज्यादा उचित होगा। यदि लोग अपनी, अपने परिवार और अपने आस-पास रह रहे जरूरतमंद लोगों की बेहतर देखभाल स्वयं करने लगें तो सरकार खुद-ब-खुद पीछे हट जाएगी

भारत के लोग स्मार्ट और सृजनात्मक होते हैं. उन्होंने यह साबित किया है कि वे परिश्रमी और मितव्ययी होते हैं. भारत की धरती को कई तरह की नेमतें मिली हुई हैं, जिनमें एक अच्छी जलवायु और ढेर सारे प्राकृतिक संसाधन शामिल हैं. इस देश का लोकतंत्र शानदार है जिसकी जड़ें बेहद मजबूत हैं और यहां का शासन कानून-सम्मत है. लेकिन अब सवाल यह है कि आज़ादी के 53 साल बाद भी भारत एक बेहद गरीब देश क्यों है?

Author: 
कँवल रेखी

संपादक:
पार्थ जे शाह
संजय कुमार साह

प्रकाशक:
सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी

 

 

 

 

 

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    यूँ तो अपना मकान हर किसी का सपना होता है। पर अपना मकान होने तक का सफर अधिकतर लोगों को किराये के मकान में रह कर ही तय करना पड़ता है। ऐसे में हर किसी को एक सस्ते मकान की तलाश रहती है। पर आलम यह है कि दिल्ली ही नहीं किसी भी महानगर में आज मकान किराये की दर आसमान छू रही है। परिणाम यह होता है कि अपने मकान का सपना साकार करने का सफर कुछ और ज्यादा लंबा हो जाता है। पर हम लोग यह नहीं सोचते कि आखिर किराया इतना अधिक क्यों है? दूसरे कई सामान की कीमत जब लगातार घटती जा रही है। तो मकानों का किराया ही क्यों बढ़े?

    कई दिनों से पश्चिम बंगाल का सिंगूर और नंदीग्राम राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में छाया रहा। सिंगूर में ममता अनशन पर बैठी रहीं, पर राज्य सरकार को ममता नहीं आई। लेकिन नंदीग्राम में बुद्धदेव जी ने अपनी भूल स्वीकार कर ही ली। वे मान रहे हैं कि वहाँ स्थानीय प्रशासन स्तर पर भारी भूल हुई है। वो भूल क्या थी, स्पष्ट नहीं किया गया। कुछ साफ पता चले तो उसके निहितार्थों पर विचार किया जा सकता है।

    उदारीकरण और निजीकरण का नुस्खा हवाई यात्रा क्षेत्र में थोड़ा सुधार लाने में तो जरूर सफल हुआ है, पर हवाई अड्डा के विकास के दौर में पीछे छूट जाने के कारण न सिर्फ यात्रियों को घोर असुविधाओं का सामना करना पड़ता है, बल्कि यह नागरिक उड्डयन क्षेत्र को भी तेजी से विकास करने से रोक रहा है। देश में हवाई अड्डे का प्रबंधन कितना खराब चल रहा है, उसे राजीव की बातें सुन कर अच्छी तरह समझा जा सकता है। पेश है यहाँ उनका अनुभव उन्हीं की जुबानी।

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