शासन

बिहार में मुख्यमंत्री नितीश कुमार को मिली हालिया चुनावी जीत ने मतदाताओं के व्यवहार में आए बदलाव की पड़ताल करने का एक अवसर दिया है। नीतीश कुमार ने बिहार को विकास के रास्ते पर आगे बढ़ाकर गरीबों का मसीहा बनने का दंभ भरने वाले लालू यादव को हालिया चुनाव में करारी शिकस्त दी है।

हर सुबह काम पर जाते वक्त मेरे रास्ते में झुग्गी-झोपड़ियां पड़ती हैं। मुझे दिखाई देते हैं मिट्टी की दीवारों और प्लास्टिक व टीन की छतों वाले छोटे-छोटे अस्थायी घर। इन घरों में कचरा बीनने वाले भी रहते हैं तो चाकरी करने वाले भी। गलियों में फेरी लगाने वाले भी रहते हैं तो रोज कुआं खोदने और रोज पानी पीने वाले मेहनतकश भी।

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मैंने बेंगलूरु के बाहरी इलाके में उदारवाद पर एक परिचर्चा में दो दिन (13 से 15 जून 2010) बिताए थे। रात हम वातानुकूलित तंबू में बिताते थे और फिर दिन में कांफ्रेंस रुम में जमा होकर भारतीय उदारवाद की परिभाषा, औचित्य और गुंजाइश जैसे भारी-भरकम विषयों पर चर्चा करते थे। अपने साथ मौजूद लोगों के बुद्धिमानी के स्तर को देखकर मैं हैरत में पड़ गया - लेकिन साथ ही, फिज़ा में उसी किस्म के आपसी असहमति के स्वर थे, जैसे कि आमतौर पर वातानुकूलित तंबुओं में रहने के बाद होते हैं।

शुरुआत के लिए, ‘भारतीय उदारवाद’ क्या है? शब्द ‘उदार’ मूल अर्थ से इतना ज्यादा हट चुका है और इतनी विविधता के साथ इस्तेमाल हो विचलित हो चुका है कि इसने अपना मूल अर्थ ही खो दिया है। मैं अपने आपको एक परंपरागत उदारवादी मानता हूं, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता, विरोध के अधिकार और मुक्त समाज में यकीन रखता है। जैसी कि यूरोपीय महाद्वीप के उदारवादियों की अपने बारे में सोच होती है। फिर भी, अमेरिका में, इसका अर्थ ठीक उल्टा होता है, जैसे कि अमेरिकी उदारवादी, वामपंथ से जुड़े, मुक्त बाजार के खिलाफ हैं, जो इस शब्द को ही विरोधाभासी बना देता है। (मेरे कुछ दोस्त तो इससे ‘निरा मूर्खतापूर्ण’ करार देते हैं)।

जनता की कमर तोड़ महंगाई के साथ कदम मिला चुके बीते वर्ष से शायद सबकी सिर्फ यही उम्मीद थी की महंगाई जैसी बीमारी से लोगों को कुछ राहत जरुर मिलेगी क्योंकि वर्ष 2009 ने जनता को महंगाई की आग में बहुत जलाया था लेकिन आग बुझने की आस लगाये बैठी जनता ने अपना एक और वर्ष 2010 के रूप में बिता डाला. गुज़रे साल मे एक तरफ अंत तक राहत के नाम पर सिर्फ महंगाई रूपी जहर को पीते-पीते दामो में बढ़ोत्तरी ही देखने को मिली वहीँ दूसरी तरफ पूरे साल ख़ुशी और देश के विकास में टकटकी लगायी आँखों को अंत में महा घोटालों का तोहफा मिला.

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नहीं, कोई ऐसा नहीं कर सकता कि वह डॉ. विनायक सेन और उनके साथियों को रायपुर की एक अदालत द्वारा आजीवन कारावास दिए जाने पर खुशी मनाए। वैचारिक विरोधों की भी अपनी सीमाएं हैं। इसके अलावा देश में अभी और भी अदालतें हैं। हमें अपनी अदालतों और अपने तंत्र पर भरोसा तो करना ही होगा। आखिर क्या अदालतें हवा में फैसले करती हैं? क्या इतने ताकतवर लोगों के खिलाफ सबूत गढ़े जा सकते हैं? ये सारे सुविधा के सिद्धात हैं कि फैसला आपके हक में हो तो सब कुछ अच्छा और न हो तो अदालतें भरोसे के काबिल नहीं हैं। भारतीय सविधान, जनतंत्र और अदालतों को न मानने वाले विचार भी यहा राहत की उम्मीद करते हैं। दरअसल यही लोकतत्र का सौंदर्य है।

2-जी स्पेक्ट्रम घोटाला मामले की जेपीसी से जांच कराने की मांग पर सरकार और विपक्ष के बीच गतिरोध के चलते संसद का पूरा शीतकालीन सत्र बिना किसी काम काज के समाप्त हो गया. इसी के साथ पूरे सत्र के दौरान एक भी दिन कामकाज नहीं हो पाने का देश के संसदीय इतिहास में एक रिकॉर्ड बन गया.

प्रसिद्ध उद्योगपति अजीम प्रेमजी ने समृद्ध और गहन सामाजिक सरोकारों का परिचय देते हुए महादान का प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत किया है। दुनिया के 28वें तथा देश के तीसरे सबसे धनी व्यक्ति अमीन अजीम प्रेमजी ने शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए 8846 करोड़ रुपयों का दान देकर दान परंपरा को नई ऊंचाई पर पहुंचाया है। उन्होंने 21.3 करोड़ शेयर अजीम प्रेमजी फाउंडेशन को देने की घोषणा की है। यह राशि विप्रो में उनकी हिस्सेदारी का लगभग 11 फीसदी है। अजीम प्रेमजी ट्रस्ट उत्तराचल, राजस्थान व कर्नाटक के दो-दो जिलों में 25 हजार स्कूलों को सहायता प्रदान कर चुका है। इससे ढाई लाख बच्चे लाभान्वित

राजस्थान के करौली जिले में भ्रष्ट वार्ड मेम्बरों की वजह से ज़रूरतमंद गरीब जनता BPL (गरीबी की रेखा से नीचे) राशन कार्ड के लाभ से वंचित है. जब कि अपने रौब और रुतबे के चलते गरीबी की रेखा से ऊपर रहने वाले लोग इस स्कीम का फायदा उठा रहे हैं.

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वोक्स यू (VoxEU) में जीसस फेलिप, उत्सव कुमार और आर्नेलिन एबडन का एक आकर्षक लेख प्रकाशित हुआ है, ‘चीन और भारतः सबसे अलग दो धुरंधर’ (china and India: Those two big outliers)। इस लेख में वे इस रोचक तथ्य का जिक्र करते हैं कि जब बात निर्यात को व्यावहारिक बनाकर परिष्कृत करने, उसमें विविधता लाने की आती है तो भारत और चीन उनके सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के लिहाज से काफी समझदार दिखते हैं। निर्यात में विविधता का जो सबूत वे पेश करते हैं, वह काफी चौंकाने वाला है-

प्रायः 'दरिद्रता' और 'निर्धनता' को पर्यायवाची के रूप में उपयोग किया जाता है किन्तु इन दोनों शब्दों में भारी अंतराल है. 'निर्धनता' एक भौतिक स्थिति है जिसमें व्यक्ति के पास धन का अभाव होता है किन्तु इससे उसकी मानसिक स्थिति का कोई सम्बन्ध नहीं है. निर्धन व्यक्ति स्वाभिमानी तथा परोपकारी हो सकता है. 'दरिद्रता' शब्द भौतिक स्थिति से अधिक मानसिक स्थिति का परिचायक है जिसमें व्यक्ति दीन-हीन अनुभव करता है जिसके कारण उसमें और अधिक पाने की इच्छा सदैव बनी रहती है. अनेक धनवान व्यक्ति भी दरिद्रता से पीड़ित होते हैं.

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