Democracy

शांतिपूर्वक तरीके से चल रहे आंदोलनों, विरोध प्रदर्शनों और रैलियों को कुचल देने की परंपराएं इतिहास के कई पन्नों मंआ दर्ज हैं। दरअसल किसी भी लोकतांत्रिक सरकार और हुकूमत के पास विद्रोह को बर्दाश्त करने की क्षमता नहीं होती। यहीं वजह है कि अपने खिलाफ उठ रही आवाजों को तमाम सरकारें दबा देती हैं। भ्रष्टाचार और काले धन पर शांतिपूर्वक चल रहे  बाबा रामदेव और उनके समर्थकों के सत्याग्रह के साथ भी ऐसा ही बर्ताव किया गया।

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भ्रष्टाचार की दुर्गंध बहुत तेजी से फैलती है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री की बेटी कनिमोझी पर सीबीआई द्वारा जल्द ही केस दायर करने की खबर के साथ ही लगता है कि अब शिकंजा कसा जाने लगा है। डीएमके की पीआर मशीन 13 अप्रैल को तमिलनाडु में होने वाले चुनाव से पहले ‘ईमानदार झूठ’ का प्रसार करने के लिए कमर कस चुकी है।

डीएमके और एआईएडीएमके दोनों को तकरीबन एक तिहाई मतदाताओं का समर्थन प्राप्त है। डीएमके की जूनियर पार्टनर कांग्रेस का नियंत्रण लगभग 12 से 15 फीसदी वोटों पर है और एआईएडीएमके के सहयोगी विजयकांत की मुट्ठी में लगभग 9 फीसदी वोट हैं। एआईएडीएमके को एंटी इंकंबेंसी (सत्ता विरोधी लहर) का फायदा हो सकता है, लेकिन मुकाबला नजदीकी होगा और पूरी संभावना है कि तमिलनाडु में गठबंधन सरकार बने। लेकिन हमारे लिए यह चिंतनीय होना चाहिए कि राजनीतिक नैतिकता को चुनौती देने के लिए भ्रष्टाचार का एक अन्य स्वरूप तेजी से उभर रहा है और बहुत संभव है कि वह उत्तरप्रदेश जैसे अन्य राज्यों को एक वायरस की तरह अपनी चपेट में ले ले।

Author: 
गुरचरण दास