प्राकृतिक संसाधन

जब हम जैसे लोग यह कहते हैं कि - जनसंख्या समष्द्धि का कारण है, केवल मनुष्य ही ऐसी प्रजाति है जो धन पैदा कर सकती है और नक्शे पर  अंकित प्रत्येक बिन्दु,  जनसंख्या की दृष्टि से सघन है और ज्यादा सम्पन्न है,  तो उनके जैसे (तथाकथित समाजवादी) लोग प्राकृतिक संसाधन की कमी की बात करते हैं। उनका तर्क है कि पृथ्वी पर संसाधन सीमित हैं तथा यदि ज्यादा लोग होंगे, तो ये जल्दी समाप्त हो जायेंगे। प्राकृतिक संसाधनों की कमी की समस्या का जूलियन साइमन ने गहनतापूर्वक अध्ययन किया। उसने दीर्घकालिक मूल्य सम्बन्धी प्रवृत्तियों का अध्ययन किया और इससे बड़े रो

ग्रामीण भारत में जल और जंगल दो सबसे ज्यादा मूल्यवान संसाधन हैं। लेकिन ये संसाधन इन इलाकों में रहने वाले लोगों के हाथ में नहीं हैं। ये राज्य के हाथ में हैं और राज्य ही इनका प्रबंधन करता है। जल और जंगल ग्रामीण समुदायों की बजाए देश की संपत्ति है। ये राष्ट्रीयकृत संसाधन हैं। इस राष्ट्रीयकरण ने ग्रामीणों को उनके बहुमूल्य आर्थिक संसाधन से वंचित कर दिया है। यह एक ऐतिहासिक अन्याय है। 
 

केंद्रीय पर्यावरण और वन  मंत्रालय द्वारा जारी राष्ट्रीय पर्यावरण नीति के मसौदे में प्रदूषक भुगतान करें,लागत न्यूनतम हो,और प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए बाजार पर आधारित प्रोत्साहनों पर बल दिया गया है। इसकी एक तार्किक परिणिती यह होनी चाहिए कि प्राकृतिक संसाधनों की स्वामित्व या प्रबंधन का जिम्मा उन समुदायों को सौंपा जाए जो उन पर निर्भर हैं। लेकिन उस मामले में यह नीति कम पड़ती है।यह कमी बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में ज्यादातर सामूहिक प्राकृतिक संसाधन मुक्त संसाधनों में बदल चुकें हैं।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपनी सरकार की उपलब्धियों को गिनाते हुए कहा है कि देश का बाजार दुनिया के लिए हमने खोला है। उनकी बात सही है। देश सचमुच आज दुनिया का बाजार बन गया है, लेकिन दुनिया के बाजार में हम कहां हैं?