भारतीय अर्थव्यवस्था

अर्थशास्त्र का एक अकाट्य सत्य है- बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से पाओगे। और कई सालों की खराब आर्थिक नीतियों व प्रबंधन के फलितार्थों के देश में चौतरफा परिलक्षित होने के साथ ही हम कह सकते हैं कि बबूल के पेड़ पर कांटे आज बहुतायत उग आए हैं। बड़े से बड़ा आशावादी भी भारतीय अर्थव्यवस्था में आई तेज गिरावट से इनकार नहीं कर सकता, हालांकि हाल तक इसे बड़ी शान के साथ रेजिलिएंट (टिकाऊ) और इंसुलेटेड (परिरक्षित) कहकर पेश किया जा रहा था। 

एक दशक भी नहीं हुआ है जब उत्साही निवेश विशेषज्ञ और आर्थिक विश्लेषक भारत की तरक्की के गीत गा रहे थे। वे कहते थे भारत में इतनी क्षमता है कि अगले दो दशकों में यह दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक होगा। इसके लिए उन्होंने स्प्रेडशीट मॉडल्स का उपयोग किया। इसमें उन्होंने 8 से 10 फीसदी प्रतिवर्ष की वृद्धि दर डाली और अगले 30 साल का अनुमान निकाला। उन्होंने एमबीए स्कूलों में सीखा था कि कैसे ऐतिहासिक दरों के आधार पर पूर्वानुमान लगाते हैं। जाहिर है, कोई भी चीज जो 10 फीसदी की चक्रवृद्धि दर से बढ़ रही हो, 30 साल में महाकाय हो जाएगी (ठीक-ठीक कहें

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपनी सरकार की उपलब्धियों को गिनाते हुए कहा है कि देश का बाजार दुनिया के लिए हमने खोला है। उनकी बात सही है। देश सचमुच आज दुनिया का बाजार बन गया है, लेकिन दुनिया के बाजार में हम कहां हैं?