शासन

पहली बार कर्नाटक सरकार ने एक प्रस्ताव दिया जिसका उद्देश्य था लोगोँ के लिए व्यक्तिगत स्तर पर स्कूल की शुरुआत करना और उसे चलाना आसान बनाना। प्रस्ताव के अनुसार, एक शैक्षिक संस्थान खोलने के लिए कोई भी प्राइवेट बॉडी लिमिटेड लायबिलिटी पार्टनरशिप (एलएलपी) रजिस्टर  कराकर काम कर सकती है, उसके लिए एक सोसायटी अथवा चैरिटेबल ट्रस्ट बनाकर कार्य करने की बाध्यता नहीं होगी। लेकिन इसकी शर्त यह होगी कि इनका प्राथमिक उद्देश्य शिक्षा ही होगा और संस्थान नॉन-प्रॉफिट शेयरिंग आधार पर ही चलेगा।

निजी स्कूलोँ को उनके क्लासरूम के आकार के हिसाब से जज करने के बजाए उनके रिजल्ट के आधार पर क्योँ नही जज किया जा सकता है? हमारे लिए लाइब्रेरी के साइज के बारे में जानने के बजाए यह जानना जरूरी क्योँ नही हो सकता है कि बच्चोँ में पढ़ने का कौशल कितना है?

निजी स्कूलोँ को उनके क्लासरूम के आकार के हिसाब से जज करने के बजाए उनके रिजल्ट के आधार पर क्योँ नही जज किया जा सकता है? हमारे लिए लाइब्रेरी के साइज के बारे में जानने के बजाए यह जानना जरूरी क्योँ नही हो सकता है कि बच्चोँ में पढ़ने का कौशल कितना है? हमारे लिए यह तय करना जरूरी क्योँ है कि एक गणित के अध्यापक की योग्यता क्या है, जबकि यह जानना जरूरी है कि उसके छात्र गणित में कितने कुशल हो रहे हैं?

कल्पना कीजिए कि आप ऐसे आदर्शवादी युवा हैं, जिसमें भावी पीढ़ी के बच्चों को प्रेरित करने की महत्वाकांक्षा है। इसलिए आप स्कूल खोलते हैं। आप अपने जैसे ही प्रेरक शिक्षक जुटाते हैं। स्कूल तत्काल सफल हो जाता है और उसे छात्रों, पालकों और समाज का सम्मान प्राप्त होता है। फिर 2010 में एक नया कानून (राइट टू एजुकेशन एक्ट) आता है। इसमें सरकारी और निजी स्कूलों के शिक्षकों में वेतन की समानता की बात है। आप अपने शिक्षकों का वेतन दोगुना कर 25 हजार प्रतिमाह करने पर मजबूर होते हैं। यहां तक कि श्रेष्ठतम निजी स्कूल जैसे दून स्कूल और मेयो को भी वेतन बढ़ाने पड़ते हैं। क

“माल-ए-मुफ्त, दिल–ए-बेरहम, फिर क्या तुम, क्या हम?” हमारी एक आदत सी हो गई है। हम हर चीज की अपेक्षा सरकार या सरकारी व्य वस्था  से करते हैं। यह ठीक है कि हमारे दैनिक जीवन में सरकार का दखल बहुत अधिक है बावजूद इसके हम उस पर कुछ ज्य़ादा ही निर्भर हो जाते हैं। एक कहावत है कि किसी समाज को पंगु बनाना है तो उसे कर्ज या फिर सब्सिडी की आदत डाल दो, वो इससे आगे कभी सोच ही नहीं पाएगा। देश की राजनीति में ये कथन बहुत मौजूं है।  

ब्रिटिश एयरवेज और लुफ्तहांसा। एयरलाइंस की दुनिया में चमकते ऐसे नाम हैं जिनके विमानों में हर शख्स एक ना एक बार यात्रा जरूर करना चाहता है। इनकी बेहतरीन सर्विस और शानदार मेहमाननवाजी का हर कोई कायल है लेकिन शुरुआत में ऐसा नहीं था। 1987 में ब्रिटेन की सरकारी एयरलाइंस ब्रिटिश एयरवेज में घाटा जब लगातार बढ़ता गया और कंपनी दिवालिया होने के कगार पर पहुंच गई तो वहां की सरकार ने एविएशन सेक्टर से निकलने का फैसला कर लिया। कुछ ऐसा ही 1994 में जर्मनी की लुफ्तहांसा के साथ हुआ। भारी घाटे और कर्ज के बोझ से लुफ्तहांसा दब चुकी थी। जर्मन सरकार ने समय रहते उसे निजी

केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) और विवादों का चोली दामन का साथ रहा है। वर्ष 1952 में अपनी स्थापना के बाद से ही सीबीएफसी का नाम अक्सर किसी न किसी विवाद से जुड़ता ही रहा है। विवाद की स्थिति कभी किसी राजनैतिक दल से करीबी रिश्ता रखने वालों को बोर्ड का प्रमुख बनाए जाने के कारण तो कभी किसी फिल्म/दृश्य को प्रसारित किए जाने की अनुमति देने अथवा न देने के कारण पैदा होती रही है। कभी किसी सीईओ के रिश्वत लेकर फिल्मों के प्रसारण की अनुमति देने के कारण तो कभी किसी फिल्म को प्रसारण की अनुमति न देने के कारण। कभी एक फिल्म में 21 कट्स लगाने का आदेश देने

हाल ही में लोकसभा में एक एक विधेयक पारित हुआ है जिसके कानून बन जाने की सूरत में देश मे लगभग आठ लाख शिक्षकों की कमी हो जाएगी। पारित विधेयक के अनुसार 31 मार्च 2019 तक सभी सरकारी ग़ैरसरकारी शिक्षको को बीएड की डिग्री हासिल करनी है अन्यथा वो कहीं पढ़ाने योग्य नही रहेंगे। लोकसभा में पारित मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार संशोधन विधेयक में हुई चर्चा के दौरान ये बात सामने आयी कि इस समय निजी स्कू लों में करीब 5 लाख और सरकारी स्कूलों में ढाई लाख से ज्यादा गैर प्रक्षिशित लोग पढ़ा रहे है जो काफी नुकसानदायक है। फिलहाल ये विधेयक राज्य सभा मे जाएगा और देश की

पुलिस दुराचरण के विरुद्ध लगातार शिकायतें मिलती रहती हैं। वर्ष 2007 में बनाए गए विभिन्न राज्यों के विकलांग पुलिस कानून में प्रावधान की गयी कमेटियों का आजतक गठन नहीं हुआ है व राजस्थान उनमें से एक है। यद्यपि इन कमेटियों के गठन से भी धरातल स्तर पर कोई लाभ नहीं होने वाला क्योंकि जांच के लिए पुलिस का ही सहारा लिया जाता है। आखिर कोई भी पेड़ अपनी शाखा को किस प्रकार काट सकता  है?

11 जुलाई, 1987 में विश्व की जनसंख्या ने 5 अरब के आंकड़े को पार किया था। तब संयुक्त राष्ट्र ने जनसंख्या वृद्धि को लेकर दुनिया भर में जागरूकता फैलाने के लिए यह दिवस मनाने का निर्णय लिया। तब से इस विशेष दिन को हर साल एक याद और परिवार नियोजन का संकल्प लेने के दिन के रूप में याद किया जाने लगा। इसी क्रम में बीते 11 जुलाई को भी दुनिया भर में 'विश्व जनसंख्या दिवस' मनाया गया। विभिन्न मंचों पर विशेषज्ञों, चिंतकों, नीति-निर्धारकों आदि ने बढ़ती जनसंख्या से जुड़ी समस्या और इसकी भयावहता से लोगों को अवगत कराते हुए अपनी चिंताएं प्रदर्शित की। विशेषज्ञों ने जन

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