सेंसर बोर्ड

केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) और विवादों का चोली दामन का साथ रहा है। वर्ष 1952 में अपनी स्थापना के बाद से ही सीबीएफसी का नाम अक्सर किसी न किसी विवाद से जुड़ता ही रहा है। विवाद की स्थिति कभी किसी राजनैतिक दल से करीबी रिश्ता रखने वालों को बोर्ड का प्रमुख बनाए जाने के कारण तो कभी किसी फिल्म/दृश्य को प्रसारित किए जाने की अनुमति देने अथवा न देने के कारण पैदा होती रही है। कभी किसी सीईओ के रिश्वत लेकर फिल्मों के प्रसारण की अनुमति देने के कारण तो कभी किसी फिल्म को प्रसारण की अनुमति न देने के कारण। कभी एक फिल्म में 21 कट्स लगाने का आदेश देने

भारत जैसे आजाद मुल्क में इन दिनों ‘बैन’ यानी ‘प्रतिबंध’ शब्द अखबारों और समाचार चैनलों में खूब सुर्खियां बटोर रहा है. आम तौर पर प्रतिबंध का नाम सुनते ही किसी ‘कठमुल्ला’ और उसके उल-जुलूल फतवे का ध्यान आता है, मगर हमारे देश में इन दिनों सेंसर बोर्ड (केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड) और प्रतिबंध एक दूसरे का पर्याय बनते नजर आ रहे हैं.

आशीष नंदी पर मामला दर्ज हो गया और कमल हासन की फिल्म विश्वरूपम को तमिलनाडु में दिखाए जाने की अनुमति तभी मिली जब वह इसके सात दृश्यों को हटाने को तैयार हो गए। सलमान रुश्दी को कोलकाता जाने नहीं दिया गया और नवीनतम घटनाक्रम में कश्मीर में लड़कियों के रॉकबैंड में गाने-बजाने के विरुद्ध फतवा जारी किया गया है। हाल के वषरें में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगातार प्रहार हो रहे हैं। हमेशा तर्क दिया जाता है कि इससे किसी विशेष जाति, संप्रदाय या वर्ग की भावना आहत होती है। यदि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ केवल मीठी-मीठी बातें करना है जिसमें किसी की निंदा या आलोचना न हो तो उस स्वतंत्रत