न्याय

भारत में न्याय मिलने में विलंब के लिए कई प्रक्रियागत खामियां जिम्मेदार हैं। न्याय प्रक्रिया में सुधार के लिए कुछ कदम उठाए जाने चाहिए। 

 

एक मामूली गरीब महिला है विजय कुमारी। उसकी कहानी इतनी आम है कि उसके बारे में आप न तो टेलीविजन के चैनलों पर सुनेंगे और न ही अखबारों में पढ़ेंगे।

बीबीसी पर पिछले दिनों अगर उसकी कहानी न दर्शाई गई होती, तो शायद मुझे भी उसके बारे में कुछ मालूम न होता, बावजूद इसके कि मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश करती कि हूं उन अनाम, रोजमर्रा की नाइंसाफियों के बारे में लिखने की, जो अदृश्य रह जाती हैं। तो सुनिए, विजय कुमारी की कहानी।

कानून के कई जानकारों का मानना है कि मौजूदा हालात में न्याय में देरी की मुख्य वजहें ये हैं जिन्हें दूर किया जाना चाहिए।

न्यायाधीश कानून का ज्ञाता होता है, उन्हें इस इच्छाशक्ति के साथ मुकदमे की सुनवाई शुरू करनी चाहिये कि जल्दी निपटारा करना है और न्याय करना है। यदि वह सख्ती का प्रयोग करें और गवाहों को उपस्थित कराने में लापरवाही बर्दाश्त न करें तो देरी होने की समस्या घट जाएगी। जज सख्त होंगे तो हर पक्ष समय से कोर्ट में पहुंचेगा।

न्यायतंत्र की धीमी रफ्तार से केवल मुवक्किल ही नहीं वकील तक परेशान हैं। एक वकील की पीड़ा इन शब्दों में प्रगट हुई - जब भी कोई मुवक्किल मुकदमा करने के लिए या कानूनी सलाह हासिल करने के लिए मेरे पास आता है तो वह यह प्रश्न जरूर करता है, कि उस को कब तक राहत मिल सकेगी?  लेकिन इस का जवाब मैं नहीं दे सकता। यदि मैं इस का कोई भी जवाब दे भी दूँ तो वह सिरे से ही मिथ्या होगा।  मैं किसी मुकदमे की उम्र का हिसाब नहीं लगा सकता और न यह कह सकता हूँ कि उस के मुकदमे का निर्णय पहली अदालत से कब हो जाएगा। ऐसे में मैं यह तो बिलकुल भी नहीं बता सकता कि उस व्यक्ति को कब राहत मिल सकेगी?

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