आयात

पिछले तीन वर्षों से हमारी अर्थव्यवस्था संकट में है। विकास दर लगातार गिर रही है, महंगाई बढ़ती जा रही है और रुपया टूट रहा है। इन सभी समस्याओं की जड़ में कुशासन ही दिखाई देता है। महंगाई बढ़ने का कारण है सरकार द्वारा अपने राजस्व का लीकेज किया जाना। जैसे सरकार का राजस्व एक करोड़ रुपया हो और उसमें 20 लाख रुपये का रिसाव करके अफसरों और नेताओं ने सोना खरीद लिया हो। अब सरकार के पास वेतन आदि देने के लिए रकम नहीं बची। ये खर्चे पूरे करने के लिए सरकार ने बाजार से कर्ज लिए।

टमाटर और प्याज समेत खाद्य पदार्थो की बेतहासा बढ़ती कीमतों को लेकर उपभोक्ता परेशान हैं, परंतु लोग भूल रहे हैं कि कुल मिलाकर कृषि उत्पादों का आयात-निर्यात उपभोक्ताओं के हित में है। देश में खाद्य तेल और दाल की उत्पादन लागत ज्यादा आती है। इनका भारी मात्र में आयात हो रहा है, जिनके कारण इनके दाम नियंत्रण में हैं। यदि हम विश्व बाजार से जुड़ते हैं तो हमें टमाटर, प्याज के दाम ज्यादा देने होंगे, जबकि तेल और दाल में राहत मिलेगी। मेरी समझ से उपभोक्ता के लिए तेल और दाल ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। अत: टमाटर और प्याज के ऊंचे दाम को वहन करना चाहिए।

अर्थशास्त्र का एक अकाट्य सत्य है- बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से पाओगे। और कई सालों की खराब आर्थिक नीतियों व प्रबंधन के फलितार्थों के देश में चौतरफा परिलक्षित होने के साथ ही हम कह सकते हैं कि बबूल के पेड़ पर कांटे आज बहुतायत उग आए हैं। बड़े से बड़ा आशावादी भी भारतीय अर्थव्यवस्था में आई तेज गिरावट से इनकार नहीं कर सकता, हालांकि हाल तक इसे बड़ी शान के साथ रेजिलिएंट (टिकाऊ) और इंसुलेटेड (परिरक्षित) कहकर पेश किया जा रहा था। 

चीनी वस्तुओं के किसी भी बाजार में छाए रहने का मुख्य कारण उनका तुलनात्मक रूप से सस्ता होना होता है। लेकिन यदि देसी वस्तु के सस्ते होने के बावजूद उसी चीनी वस्तु की भारी मात्रा आयात की जाए और यहां के उत्पादकों की अनदेखी की जाए तो इसे नीति निर्धारकों की अदूरदर्शिता  नहीं तो और क्या कहेंगे।

 

चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है, लेकिन उसके साथ भारत का 29 अरब डॉलर का विशाल व्यापार घाटा भी है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने चीनी जोड़ीदार ली ख छ्यांग से हाल की मुलाकात में कहा कि इस घाटे का 'कुछ किया जाना चाहिए।' लेकिन एक अर्थशास्त्री के रूप में वे अवश्य ही यह जानते हैं कि हर व्यापारिक भागीदार के साथ व्यापार घाटे को संतुलित करने की सोच गलत है।

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

 

अन्य क्षेत्रों की तरह यहां भी चीनी सरकार ने बाजी मार ली है। 1960 का आयातक चीन आज तमाम देशों को गेहूं निर्यात करता है। वहां की सरकार ने एक अलग तरह का दोहरा मॉडल अपनाया है। विश्व में सर्वाधिक आबादी वाले इस देश में किसानों को पर्याप्त सब्सिडी दी जाती है, पर बाजार खुला है।

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