शेयर बाजार

यदि किसी असाधारण उत्प्रेरक की संभावना को छोड़ दें तो मई महीने में शेयर बाजार में अक्सर सुस्ती देखने को मिलती है। उदाहरण के लिए पिछले साल बड़े बड़े रिफार्म का वादा कर सत्ता के करीब पहुंच रही मोदी सरकार से बाजार ने बड़ी उम्मीदें लगाई थीं। परिणाम स्वरुप शेयर बाजार में जबरदस्त उछाल देखने को मिला था। किंतु सरकार के कार्यकाल के एक साल पूरा होने को है लेकिन अबतक कोई बड़ा रिफार्म धरातल पर उतरता दिखाई नहीं दे रहा है। इसके अलावा घरेलू स्तर पर मानसून ही एक ट्रिगर होता है जो बाजार को सांत्वना देता है। लेकिन अल नीनो इफेक्ट के कारण इस वर्ष मानसून के औसत से

अगर आप जमीन की तरफ ही देखते रहें तो आपको इंद्रधनुष कभी नहीं दिखेगा। भारतीय वित्तीय बाजार अब चार्ली चैपलिन के इस सूत्र को मंत्र की तरह जप रहा है। पिछले तीन सालों में यह पहला वर्षात है जब भारत के बाजार यंत्रणाएं भूलकर एकमुश्त उम्मीदों के साथ नए साल की तरफ बढ़ रहे हैं। सियासी अस्थिरता और ऊंची ब्याज दरों के बीच बल्लियों उछलते शेयर बाजार की यह सांता क्लाजी मुद्रा अटपटी भले ही हो, लेकिन बाजारों के ताजा जोशो खरोश की पड़ताल आश्वस्त करती है कि किंतु-परंतु के बावजूद उम्मीदों का यह सूचकांक आर्थिक-राजनीतिक बदलाव के कुछ ठोस तथ्यों पर आधारित है।

देशवासी हर नेता को भ्रष्ट मानते हैं। ऐसे में उदास होने की जरूरत नहीं है। हमें भ्रष्ट नेताओं में सही नीतियां बनाने वाले को समर्थन देना चाहिए। यदि घूस लेने वाले और गलत नीतियां बनाने वाले के बीच चयन करना हो तो मैं घूस लेने वाले को पसंद करूंगा। कारण यह कि घूस में लिया गया पैसा अर्थव्यवस्था में वापस प्रचलन में आ जाता है, लेकिन गलत नीतियों का प्रभाव दूरगामी और गहरा होता है। ऐसे में देश की आत्मा मरती है और देश अंदर से कमजोर हो जाता है। आम तौर पर माना जाता है कि भ्रष्टाचार का आर्थिक विकास पर दुष्प्रभाव पड़ता है। मसलन भ्रष्टाचार के चलते सड़क कमजोर बनाई जाती है, जिससे वह जल्दी टूट