निजी स्कूल

निजी स्कूलोँ को उनके क्लासरूम के आकार के हिसाब से जज करने के बजाए उनके रिजल्ट के आधार पर क्योँ नही जज किया जा सकता है? हमारे लिए लाइब्रेरी के साइज के बारे में जानने के बजाए यह जानना जरूरी क्योँ नही हो सकता है कि बच्चोँ में पढ़ने का कौशल कितना है?

निजी स्कूलोँ को उनके क्लासरूम के आकार के हिसाब से जज करने के बजाए उनके रिजल्ट के आधार पर क्योँ नही जज किया जा सकता है? हमारे लिए लाइब्रेरी के साइज के बारे में जानने के बजाए यह जानना जरूरी क्योँ नही हो सकता है कि बच्चोँ में पढ़ने का कौशल कितना है? हमारे लिए यह तय करना जरूरी क्योँ है कि एक गणित के अध्यापक की योग्यता क्या है, जबकि यह जानना जरूरी है कि उसके छात्र गणित में कितने कुशल हो रहे हैं?

राजधानी दिल्ली के शिक्षा निदेशालय के हवाले से मीडिया में प्रकाशित खबरों के मुताबिक शैक्षणिक सत्र 2017-18 में ईडब्लूएस कैटेगरी के तहत नर्सरी कक्षाओं दाखिलों के लिए कुल 1,13,991 आवेदन प्राप्त हुए। बीते दिनों निदेशालय द्वारा लॉटरी/ ड्रॉ प्रक्रिया के बाद कुल उपलब्ध 31,653 सीटों के लिए पहली सूची जारी की गयी। निजी स्कूलों में दाखिले की इच्छा रखने वाले 82,338 छात्रों के अभिभावकों के लिए उहापोह की स्थिति बनी हुई है। उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि उनके बच्चों को दाखिला कैसे मिलेगा।

अनएडेड प्राइवेट स्कूलों के फीस को रेग्युलेट करना दरअसल, टीएमए पई बनाम कर्नाटक सरकार मामले में सर्वोच्च न्यायालय के 11 सदस्यीय खण्डपीठ के फैसले की अवज्ञा है। सरकार द्वारा अनएडेड प्राइवेट स्कूलों के फीस को रेग्युलेट करना, न केवल संविधान द्वारा उन्हें प्रदत्त संरक्षण का स्पष्ट उल्लंघन है बल्कि निष्प्रभावी और अबाध्यकारी भी है। निसा के माध्यम से हमने इस मुद्दे को उठाया है और बार-बार दोहराया भी है कि ऐसी कार्रवाई माननीय सर्वोच्च न्यायालय 11 न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ के निर्णय का अपमान है और माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की अवमानना करना ह

ऐसा प्रतीत होता है कि आजादी के सात दशक बीतने के बाद भी सरकारें यह नहीं समझ सकी हैं कि देश के नौनिहालों को गुणवत्ता युक्त शिक्षा प्रदान करने के लिए बच्चों को केवल स्कूल तक पहुंचा देने भर से ही काम नहीं बनेगा। तमाम सरकारी एवं गैरसरकारी आंकड़ें यह सिद्ध करने के लिए काफी हैं कि शिक्षा का अधिकार कानून, मिड डे मिल योजना, निशुल्क पुस्तकें, यूनिफार्म आदि योजनाओं के परिणामस्वरूप स्कूलों में दाखिला लेने वालों की संख्या तो बढ़ी हैं लेकिन छात्रों के सीखने का स्तर बेहद ही खराब रहा है। देश में भारी तादात में छात्र गणित, अंग्रेजी जैसे विषय ही नहीं, बल्कि सा

विकास की मंजिल पाने की मुख्य राह शिक्षा दिखाएगी। तरक्की में शिक्षा अहम है। यह जुमला विद्वानों की सभा से लेकर, गोष्ठिïयों, संगोष्ठियों में खूब सुनाई देगा। मगर उज्जवल भविष्य की नींव कहलाने वाली शिक्षा, आम जन की पहुंच से उतनी दूर और मुश्किल हो रही है, जैसे मंगल पर पानी की खोज। चुनावी बिसात पर बैठे नेताओं ने अनिवार्य और निशुल्क शिक्षा को आरटीई के सांचें में ढाला। मगर यहां भी बढ़ती मुनाफाखोरी ने अनिवार्य शिक्षा के अधिकार को कुचलता हुआ आगे निकल गया। स्कूलों के गेट पर सुबह ६ बजे से बच्चों के एडमिशन के लिए लगी अभिभावकों की लंबी कतारों से जाहिर होता ह

संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों में शिक्षा के अधिकार को शामिल किए जाने के बाद एक बार वह पुराना सवाल फिर उठने लगा है। सवाल यह कि देश के सभी बच्चों को एक समान शिक्षा का अधिकार मिलना ही चाहिए। 1935 में जब भारत सरकार अधिनियम के तहत गठित राज्यों की सरकारों को जिन आठ विषयों पर शासन करने का अधिकार तत्कालीन अंग्रेज सरकार ने दिया था, उनमें से एक अधिकार शिक्षा व्यवस्था का भी संचालन था। गांधीजी को तब आने वाली चुनौतियों का पता था, इसीलिए उन्होंने डॉक्टर जाकिर हुसैन की अध्यक्षता में राज्यों की शिक्षा व्यवस्था कैसी हो, इस पर विचार करने की जिम्मेदारी दी थी।

प्राइवेट स्कूलों द्वारा फीस में की जा रही मनमानी वृद्धि को लेकर पैरंट्स मे खासा आक्रोश है। हर नए साल में 30-40 प्रतिशत फीस बढ़ाना सामान्य बात हो गई है। पैरंट्स की मांग है कि सरकार स्कूल मालिकों की इस मनमानी पर अंकुश लगाए। उनकी मांग सही है। शिक्षा को पूरी तरह बाजार पर नहीं छोड़ा जा सकता। लेकिन, सरकारी दखल की अलग समस्याएं है। पूरे देश में सरकारी स्कूलों की बदहाली बताती है कि सरकारी दखल से प्राइवेट स्कूलों का भी यही हाल हो जाएगा।

पिछले एक दशक में देश में शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के तेज प्रयास देखने को मिले हैं। 6 से 14 वर्ष के बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा की गारंटी प्रदान करने वाला 'शिक्षा का अधिकार अधिनियम-2009' (आरटीई एक्ट) सुधार के प्रयासों की एक अत्यंत महत्वपूर्ण कड़ी है। वर्तमान केंद्र सरकार द्वारा नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) बनाने की कवायद भी सुधार का अगला चरण हैं। हालांकि इससे पहले सन् 1968 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और बाद में सन् 1986 में राजीव गांधी सरकार द्वार नई शिक्षा नीतियां लागू की गईं। वर्ष 1992 में इसमें कुछ छोटे-छोटे बदलाव भी

आज से ठीक पांच साल पहले १ अप्रैल २०१० को 'शिक्षा का अधिकार' क़ानून ८६वें संशोधन के तहत लागू किया गया था। इस क़ानून को लागू करने के पीछे मुख्य उद्देश्य यही था कि 6 वर्ष से 14 वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त शिक्षा की गारंटी दी जाय। इस क़ानून के लागू होने के बाद शिक्षा प्राप्त करना न सिर्फ हर बच्चे का अधिकार बना बल्कि सरकार की यह जवाबदेही तय हो गयी कि वो 6 से 14 साल के प्रत्येक बच्चे की शिक्षा सुनिश्चित कर सके। प्रथम दृष्टया जब इस  कानून और  इसके उद्देश्यों को देखते हैं तो बेहद आदर्श स्थिति नजर आती है। ऐसा लगता है कि सबको शिक्षा मुहैया कराने

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