GST

किसी व्यक्ति के सशक्त होने का व्यवहारिक मानदंड क्या है? इस सवाल के जवाब में व्यवहारिकता के सर्वाधिक करीब उत्तर नजर आता है- आर्थिक सक्षमता। व्यक्ति आर्थिक तौर पर जितना सम्पन्न होता है, समाज के बीच उतने ही सशक्त रूप में आत्मविश्वास के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। निश्चित तौर पर आर्थिक मजबूती के लिए अर्थ को अर्जित करना ही पड़ता है। भारतीय अर्थ परम्परा में धर्म और अर्थ को परस्पर पूरक तत्व के रूप में प्रस्तुत करते हुए महर्षि चाणक्य ने भी कहा है- धर्मस्य मूलम अर्थम्। यानी, धर्म के मूल में अर्थ अनिवार्य तत्व है।

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शिवानंद दिवेदी

काले धन का जवाब है वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी)। भाजपा शासित प्रदेश जीएसटी का रास्ता रोक कर काले धन पर अंकुश न लगाने के सबसे बड़े दोषी हैं। इस तरह वे काले धन की महामारी को फैलने में सहयोग प्रदान कर रहे है। देश भर में बाबा रामदेव के प्रति जबरदस्त श्रद्धा है। उन्होंने योग के प्रति जागरूकता पैदा कर करोड़ों लोगों को स्वस्थ जीवन की ओर प्रेरित किया, किंतु एक क्षेत्र विशेष में ठोस उपलब्धियों का यह मतलब नहीं कि वह काले धन के विशेषज्ञ हो गए है। उनकी मंशा तो अच्छी है, किंतु वह काले धन के अर्थशास्त्र को नहीं समझते। न तो रामदेव और न ही भाजपा यह समझती है कि भारतीयों द्वारा विदेशी बैंकों में जमा किए गए काले धन से कहीं बड़ी मात्रा में काला धन भारत में मौजूद है। इसलिए देश की पहली प्राथमिकता देश के अंदर काले धन पर रोक लगाने की होनी चाहिए और इसका सर्वश्रेष्ठ उपाय है जीएसटी लागू करना। जीएसटी व्यापारियों और नागरिकों के नकद व्यवहार पर रोक लगाता है, क्योंकि इसमें कर के भुगतान पर प्रोत्साहन है।

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गुरचरण दास

प्रिय प्रधानमंत्री जी, आज आपकी सरकार की विश्वसनीयता दांव पर लगी हुई है। भ्रष्टाचार, नीति-निर्धारण में विचलन और एक पंगु शासन ने देश चलाने की संप्रग सरकार की क्षमता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आप ऐसा आभास देते हैं जैसे आप पद पर तो हैं, लेकिन ताकत आपके पास नहीं। फिर आपको क्या करना चाहिए? मेरे विचार से इस सवाल का उत्तार काफी कुछ उन संकेतों में निहित है जो पिछले दिनों कुल मिलाकर निराशाजनक प्रेस कांफ्रेंस में आपने दिए। सरकार को अपनी ताकत वाले क्षेत्रों का इस्तेमाल करना चाहिए और अपना इकबाल नए सिरे से स्थापित करना चाहिए।

Author: 
गुरचरण दास