एजुकेशन

दो दशक पूर्व लाइसेंस, परमिट, कोटा आधारित प्रशासनिक व्यवस्था के दौर में जब अधिकांश सेवा प्रदाता कंपनियां सार्वजनिक क्षेत्र की यानि सरकारी हुआ करती थीं तब उपभोक्ताओं के लिए उन सेवाओं को हासिल करना टेढ़ी खीर हुआ करती थीं। बात चाहे हवाई जहाज की यात्रा करने की हो या टेलीफोन कनेक्शन लेने की, ऐसी सेवाएं लग्जरी की श्रेणी में शामिल हुआ करतीं थीं और स्टेटस सिंबल के तौर पर जानी जाती थीं और मध्यवर्ग के लिए ऐसा कर पाना किसी बड़े सपने के पूरा होने से कम नहीं हुआ करता था। इसके अलावा सेवा की गुणवत्ता की बात करना तो जैसे दूसरी दुनियां की बात थी। लेकिन आज परिस

शिक्षा के क्षेत्र में हमें गुणवत्ता पर केन्द्रित रहना चाहिये और यह सुनिश्चित करना चाहिये कि दाखिला प्राप्त करने वाला प्रत्येक विद्यार्थी सीखने के लक्ष्य की सबसे सीधी राह को पा सकें।

भारत में शिक्षा के लिए संसाधन जुटाने की तमाम कोशिशें हो रही हैं। शिक्षा उपकर से लेकर न जाने क्या-क्या? पर हकीकत ये है कि सरकार जो पैसे खर्च करती हैं, उसका भारी दुरुपयोग होता है। क्यों न शिक्षा के लिए आवंटित पैसे सीधे-सीधे छात्रों को वाउचर के रूप में दे दिया जाए - पेश है इस पर एक पड़ताल।

- 'एजुकेशनः फिलॉसफी, पॉलिसी एंड प्रैक्टिस' विषयक वर्कशॉप के दौरान शिक्षा के वर्तमान व भावी स्वरूप और नीतियों पर हुई गहन चर्चा
- सेंटर फॉर सिविल सोसायटी और आजादी.मी ने मीडियाकर्मियों के लिए किया था दो दिवसीय वर्कशॉप का आयोजन

वह एक जाने माने अर्थशास्त्री हैं, लेकिन अमेरिका के सांटा क्लारा यूनिवर्सिटी में बतौर प्रोफेसर लॉ पढ़ाते हैं। उन्होंने स्वयं किसी विश्वविद्यालय से लॉ और इकोनॉमिक्स की डिग्री हासिल नहीं की है बल्कि हावर्ड से फिजिक्स और केमेस्ट्री की पढ़ाई की है। हालांकि इकोनॉमिक्स और लॉ पर उन्होनें कई किताबें लिखी हैं जो कि दुनियाभर के इकोनॉमिस्ट्स और लॉ एक्सपर्ट्स के बीच काफी लोकप्रिय है। हम बात कर रहे हैं स्वयं को अनार्किस्ट-अनाक्रोनिस्ट इकोनॉमिस्ट कहलाना पसंद करने वाले प्रो.

भारतीय शिक्षा  नीति के क्षेत्र में – द रिपोर्ट आफ द रिव्यू कमेटी आन द दिल्ली स्कूल एजुकेशन एक्ट एंड रूल्स,1973  जैसी प्रगतिशील रपट शायद देश  को कभी देखने को नहीं मिली । इस रपट का श्रेय इन तीन खंड़ों की मसौदा कमेटी की अध्यक्ष और दिल्ली की  पूर्व मुख्य सचिव शैलजा चंद्र को है।