औद्योगिकीकरण

विख्यात सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा राय ने कांग्रेस एवं संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी की नेतृत्व वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद छोड़कर राजनीतिक रूप से भी हलचल पैदा की है। वह इस परिषद में इसलिए काम करने को तैयार नहीं हैं, क्योंकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मनरेगा मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी की दर से वेतन दिए जाने की अनुशंसा को अस्वीकार कर दिया। ऐसा लगता है कि मनमोहन सरकार के प्रति उनकी नाराजगी कुछ ज्यादा ही है, क्योंकि राष्ट्रीय सलाहकार परिषद से मुक्त होने के बाद उन्होंने केंद्रीय सत्ता पर यह आरोप भी मढ़ा कि वह आम लोगों को नजरअंदाज कर आर्थिक वृद्धि हासिल करने पर तुली ह

अठारहवी सदी में अंद्रेजों के समय में जस्टिस के तौर पर काम करनेवाल महादेव गोविंद रानाडे  बहुआयामी व्यक्तित्व थे। वे ऊचे दर्जे के उदावादी चिंतक थे तो जुझारू समाज सुधारक भी। वे भारत की औद्योगिक क्रांति के स्वप्नद्रष्टा थे जिन्होंने अपने स्वप्न को साकार करने की भरपूर कोशिश की। उनकी दृढ़ मान्यता थी यदि भारत की गरीबी को दूर करना है तो उसका एक ही उपाय है तीव्रगति से औद्योगिक विकास। इसके लिए वे आर्थिक समस्याओं के अध्ययन के लिए संस्थानों की स्थापना करना चाहते थे। उन्होंने 1885 में नेशनल सोशल कान्फ्रेंस और 1890 में इंडस्ट्रियल एसोसिएशन की स्थापना की। इन संगठनों द्वारा तैयार कि

ध्यान हो तो धन भी सुंदर है। ध्यानी के पास धन होगा, तो जगत का हित ही होगा, कल्याम ही होगा। क्योंकि धन ऊर्जा है। धन शक्ति है। धन बहुत कुछ कर सकता है। मैं दन विरोधी नहीं हूं। मैं उन लोगों में नीहं, जो समझाते हैं कि धन से बचो। भागो धन से। वे कायरता की बातें करते हैं। मैं कहता हूं जियो धन में, लेकिन ध्यान का विस्मरण न हो। ध्यान भीतर रहे, धन बाहर। फिर कोई चिंता नहीं है। तब तुम कमल जैसे रहोगे, पानी में रहोगे और पानी तुम्हें छुएगा भी नहीं।