कैश ट्रांसफर स्कीम

“माल-ए-मुफ्त, दिल–ए-बेरहम, फिर क्या तुम, क्या हम?” हमारी एक आदत सी हो गई है। हम हर चीज की अपेक्षा सरकार या सरकारी व्य वस्था  से करते हैं। यह ठीक है कि हमारे दैनिक जीवन में सरकार का दखल बहुत अधिक है बावजूद इसके हम उस पर कुछ ज्य़ादा ही निर्भर हो जाते हैं। एक कहावत है कि किसी समाज को पंगु बनाना है तो उसे कर्ज या फिर सब्सिडी की आदत डाल दो, वो इससे आगे कभी सोच ही नहीं पाएगा। देश की राजनीति में ये कथन बहुत मौजूं है।  

‘देर आए, दुरुस्त आए’। यह मुहावरा केंद्र सरकार की सब्सिडी के बदले सीधे बैंक में “कैश ट्रांसफर” योजना पर बिल्कुल सटीक बैठता है। सिर्फ जरूरतमंदों को सब्सिडी का लाभ प्रदान करने के उद्देश्य से शुरू की गई कैश ट्रांसफर योजना अपने प्रायौगिक चरण में ही सकारात्मक परिणाम देने लगी है। बात चाहे राजस्थान के अलवर जिले में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से सब्सिडाइज्ड रेट पर कैरोसिन तेल बांटने की जगह सब्सिडी के बराबर की धनराशि सीधे बैंक में जमा करने के कदम की हो या कर्नाटक के मैसूर जिले में गैस सिलेंडर पर दी जाने वाली सब्सिडी के बराबर कैश ट्रांसफर की। दोनों मामलों में जिस तरह के सकारा