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निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से निर्मित शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई एक्ट 2009) आने और वर्ष 2010 से लागू होने के 7 वर्ष पूरे हो चुके हैं। लेकिन इतनी बड़ी समयावधि बीत जाने के बाद भी तमाम समस्याएं अब भी बरकरार हैं। एक तरफ स्कूल आरटीई के प्रावधानों को अव्यवहारिक बताकर इसकी मुखालफत कर रहे हैं वहीं सरकार हर हाल में उन प्रावधानों को लागू कराना चाहती है। तय समय सीमा के भीतर प्रावधानों के लागू न किए जाने की दशा में स्कूलों पर तगड़े जुर्माने और उन्हें बंद करने का नियम है। गैर आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक आरटीई कानून आने के बाद स

भारतीय संविधान के नीति निर्देशक सिंद्धांतों में 6 से 14 साल के सभी बच्चों के निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान है। किंतु अर्थाभाव और राजनीततिक उदासीनता के चलते इन सिद्धांतों पर अमल नहीं हो पाया। माननीय अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने मामले को गंभीरता से लिया पर अंततः 2009 में माननीय डा. मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार ने निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा अधिनियम को लागू किया और 2010 में इसकी अधिसूचना जारी कर दी गई। हालांकि आरटीई एक्ट में कई त्रुटियां थीं और इस कानून का मकसद पूरा नहीं हो पाया।

शिक्षा का अधिकार क़ानून-२००९ लागू होने के बाद यह उम्मीद जताई गयी कि यह क़ानून प्राथमिक स्तर पर देश के गरीब से गरीब बच्चे की शिक्षा को सुनिश्चित करेगा। लेकिन अपने पेंचीदा प्रावधानों की वजह से आज यह क़ानून ही सवालों के घेरे में खड़ा हो गया है। इससे पहले की हम शिक्षा के अधिकार क़ानून की खामियों पर बात करें, हमे इस बात पर गौर करना होगा कि कोई भी क़ानून लाने का उद्देश्य क्या होता है?

निजी स्कूलों की दाखिला प्रक्रिया से लेकर वहां ली जाने वाली फीस पर सूबे का सियासी पारा चढ़ सकता है। दिल्ली सरकार ने जहां इन दोनों मुद्दों पर निजी स्कूलों पर नकेल कसने की कवायद शुरू कर दी है, वहीं स्कूल प्रबंधक भी सरकार के ऐसे किसी भी कदम से निपटने के लिए लामबंद होना शुरू हो गए हैं। स्कूल प्रबंधक सरकार के किसी भी अंकुश के खिलाफ जहां सड़क पर उतर सकते हैं, वहीं इस मामले में वह न्यायालय का दरवाजा भी खटखटा सकते हैं।
 
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