वोट बैंक

1995 में सीके जाफर शरीफ के बाद पवन कुमार बंसल रेल बजट पेश करने वाले पहले कांग्रेसी रेल मंत्री हैं। इसलिए लोग उम्मीद कर रहे थे कि इस बार 'रीजनल' नहीं 'नैशनल' रेल बजट आएगा। लेकिन कुछेक अपवादों को छोड़कर रेल बजट लकीर का फकीर ही साबित हुआ। 1990 के दशक में शुरू हुई गठबंधन राजनीति के नफा-नुकसान पर बहस हो सकती है लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि इसने भारतीय रेल का कबाड़ा कर दिया। इस दौरान रेल मंत्रालय को सहयोगी दलों को दहेज में दिया जाने वाला 'लग्जरी आइटम' मान लिया गया। सहयोगी दलों से बनने वाले रेल मंत्रियों ने इसका जमकर फायदा उठाया और उनमें रेलवे से जुड़ी परियोजनाओं को अपने-अपने गृह

बीटल्स का एक गीत है, 'कैंट बाय मी लव' (अपने लिए मैं प्यार तो नहीं खरीद सकता)। इसी तर्ज पर इस साल के बजट की थीम है, 'अपनी पार्टी के लिए मैं चुनाव तो नहीं खरीद सकता'। वित्तमंत्री आम तौर पर चुनाव से ठीक पहले वाले बजटों में सब्सिडी और कर्ज माफी के रूप में खुले हाथों रेवड़ियां बांटते हैं। ऐसे उपाय वोट दिलाने में ज्यादा कारगर नहीं होते, फिर भी वित्तमंत्री अपनी तरफ से उम्मीद नहीं छोड़ते। बहरहाल, वित्तमंत्री पलनियप्पन चिदंबरम ने अभी जो चुनावी बजट पेश किया है, उसमें उन्होंने मुफ्त का चंदन घिसने से भरसक परहेज किया है। वित्तीय मितव्यय को ध्यान में रखते हुए उन्होंने वोट हासिल करने के

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

लकड़ी चाहे कितनी ही मजबूत क्यों न हो, अगर उसमें घुन लग जाए तो अच्छी भली मजबूत लकड़ी भी खोखली हो जाती है। भारतीय लोकतंत्र के लिए सब्सिडी भी किसी घुन की तरह ही है। ऊपर से सब्सिडी भले हानिकारक न दिख रही हो, लेकिन वास्तविकता यही है कि यह लोकतंत्र को खोखला कर रही है। सब्सिडी को जिस तबके के लिए फायदेमंद बताया जाता है, यह उस तबके का भला नहीं करती। यह तो बिचौलियों के लिए मलाई जैसी होती है। सब्सिडी जन कल्याण का छलावा भर है। भारत में लोगों को लगता है कि यहां जो सब्सिडी की व्यवस्था लागू है, वह गरीबों की हितैषी है, जबकि हकीकत यह है कि सरकार जितना सब्सिडी देती है, उससे ज्यादा राशि गरी