कालाबाजारी

 

हाल ही में दवा मूल्य नियंत्रण आदेश के तहत 652 दवाओं को मूल्य नियंत्रण के दायरे में लाया गया है। पहली नजर में यह फैसला आम आदमी के हित में दिखता है। इसके लागू हो जाने से दवाओं की कीमतों में औसतन 20-25 फीसदी की कमी होने की संभावना है। कुछ दवाओं की कीमतें तो 80 फीसदी तक घट सकती हैं। ये दवाएं एलर्जी, हृदय संबंधी, गैस्ट्रो-इन्टेस्टाइनल, मधुमेह, तपेदिक और कुष्ठ रोग वगैरह की हैं। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि मूल्य नियंत्रण हमेशा फायदे का सौदा नहीं होता। इसके साथ ही सरकारी हस्तक्षेप का दायरा बढ़ने से भ्रष्टाचार के नए मौके भी उत्पन्न होते हैं।

‘देर आए, दुरुस्त आए’। यह मुहावरा केंद्र सरकार की सब्सिडी के बदले सीधे बैंक में “कैश ट्रांसफर” योजना पर बिल्कुल सटीक बैठता है। सिर्फ जरूरतमंदों को सब्सिडी का लाभ प्रदान करने के उद्देश्य से शुरू की गई कैश ट्रांसफर योजना अपने प्रायौगिक चरण में ही सकारात्मक परिणाम देने लगी है। बात चाहे राजस्थान के अलवर जिले में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से सब्सिडाइज्ड रेट पर कैरोसिन तेल बांटने की जगह सब्सिडी के बराबर की धनराशि सीधे बैंक में जमा करने के कदम की हो या कर्नाटक के मैसूर जिले में गैस सिलेंडर पर दी जाने वाली सब्सिडी के बराबर कैश ट्रांसफर की। दोनों मामलों में जिस तरह के सकारा

राजकोषिय घाटे को कम करने के उपाय के तहत किसी भी सरकार की निगाह सबसे पहले पेट्रोलियम पदार्थों पर दी जाने वाली भारी भरकम सब्सिडी पर ही केंद्रीत होती है। राष्ट्रीय आय को बढ़ाने में असफल सरकारें अपने घाटे को कम करने के लिए सबसे पहले सब्सिडी को ही घटाने का फैसला लेती हैं। कभी अंतराष्ट्रीय कीमतों का हवाला देकर तो कभी पेट्रोलियम कंपनियों को होने वाले नुकसान की बात कह सब्सिडी घटाने का काम किया जाता है। हालांकि थोड़ा-थोड़ा कर सब्सिडी घटाने का फायदा न तो अर्थव्यवस्था को मिल पाता है ना ही जनता को हमेशा के लिए इससे मुक्ति। और तो और कालाबाजारियों को लूट खसोट करने और पैसा बनाने का मौका