फायदा

अपनी युवावस्था के दिनों में मैंने निचले स्तर तक आर्थिक लाभ के सिद्धांत (थ्योरी ऑफ इकोनॉमिक ट्रिकल डाउन) के बारे में सुना था। इसके मुताबिक अगर अमीर और अधिक अमीर होंगे तो गरीबों को भी इसका लाभ मिलेगा और इस वजह से यह सबके लिए फायदेमंद रहेगा। ऐसा माना जा रहा था कि यह इस बात का भी खुलासा कर देगा, कार्ल मार्क्स के विपरीत, कि यह सच नहीं है कि अमीर और अमीर हो गए, जबकि गरीब और गरीब। इसके विपरीत हुआ यह कि दोनों ही साथ-साथ अमीर हुए। अमेरिका में गरीबी की रेखा 11 हजार डॉलर प्रति वर्ष (पांच लाख रुपए प्रति वर्ष) की चौंकाने वाली ऊंचाई तक पहुंच गई है। इतिहास

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

पिछले तीन वर्षों से हमारी अर्थव्यवस्था संकट में है। विकास दर लगातार गिर रही है, महंगाई बढ़ती जा रही है और रुपया टूट रहा है। इन सभी समस्याओं की जड़ में कुशासन ही दिखाई देता है। महंगाई बढ़ने का कारण है सरकार द्वारा अपने राजस्व का लीकेज किया जाना। जैसे सरकार का राजस्व एक करोड़ रुपया हो और उसमें 20 लाख रुपये का रिसाव करके अफसरों और नेताओं ने सोना खरीद लिया हो। अब सरकार के पास वेतन आदि देने के लिए रकम नहीं बची। ये खर्चे पूरे करने के लिए सरकार ने बाजार से कर्ज लिए।

दलित इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (डिक्की) की ओर से बीते 6 जून को एक नया वेंचर कैपिटल फंड शुरू किया गया। इस फंड का मकसद है दलितों और आदिवासियों द्वारा चलाई जा रही कंपनियों में निवेश के लिए निवेशकों से 500 करोड़ रुपये जुटाना। कृपया इस पहल को सकारात्मक कार्रवाई (अफर्मेटिव एक्शन) के नाम पर उठाए गए एक और सदाशयी कदम की तरह न देखें।

पिछले छह वर्षों में खेत मजदूरों की मजदूरी काफी तेजी से बढ़ी है और इसके बढ़ने की रफ्तार चीजों की कीमतें बढ़ने की रफ्तार से ज्यादा रही है। इसका नतीजा ग्रामीण मजदूरों का जीवन स्तर सुधरने रूप में दिखाई पड़ा है। 2007-08 से लेकर अबतक देश के इस सर्वाधिक विपन्न तबके की आय में 6.8 प्रतिशत की वास्तविक सालाना बढ़त दर्ज की गई है। इस शानदार रुझान के पीछे क्या है?

थैचरिज्म सरकार, बाजार व नागरिक संगठनों की उपयुक्त भूमिका वाले दर्शन पर आधारित था। सरकार को केवल उन्हीं कार्यों को करना चाहिए जो बाजार व नागरिक संगठन प्रभावी ढंग से नहीं कर सकते। और मुक्त प्रतियोगिता बाजार का बेहतर नियामक और उपभोक्ताओं का बेहतर संरक्षक है।

इलाहाबाद में इन दिनों महाकुंभ मेले की धूम मची है। महाकुंभ में स्नान कर अपने सभी दुखों से निवारण करने की चाह में देशभर के लोग अपने अपने काम-धंधे और रोजगार से छुट्टी लेकर यहां महीने भर डेरा जमाए रहते हैं। अल सुबह से ही संगम के तीरे डेरा डाले रहने के बावजूद त्रिवेणी के संगम स्थल पर मन भरकर डुबकी लगाने की इच्छा कुछेक लोगों को ही प्राप्त होता है। बाकी बस किसी प्रकार दूर किनारे से ही डुबकी लगा अपने को तृप्त मान लेते हैं।

खुदरा कारोबार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को लेकर इन दिनों देश में बहस का दौर जारी है। इससे ग्राहकों, स्थानीय खुदरा कारोबारियों और खुदरा कारोबार के वैश्विक दिग्गजों के हित जुड़े हों तो बहस होना स्वाभाविक ही है। पिछले कई साल से इस पर बातचीत जारी है लेकिन इस दौरान कोई बड़ा कदम नहीं उठाया गया है। फिलहाल औद्योगिक नीति एवं संवद्र्घन विभाग (डीआईपीपी) ने एफडीआई से जुड़े जिन व्यापक मुद्दों पर चर्चा पत्र पेश किया है, उसका स्वागत किया जाना चाहिए। इसके जरिये विभाग ने सभी अंशधारकों का पक्ष जानने की कोशिश की है।

क्या राबर्ट वढेरा के बारे में भंडाफोड़ भ्रष्टाचार को खत्म कर देगा ? या यह एक और सनसनी है जो मध्यम वर्ग को कुछ सप्ताह तक झनझनाती रहेगी और फिर उसे भुला दिया जाएगा। क्या राजनीति भारत का अबतक का सबसे बड़ा धंधा है?

मैं बहुत आशावादी नहीं हूं। हर पार्टी के राजनीतिज्ञ अपने प्रतिद्वंदियों पर कीचड उछालना पसंद करते हैं। एक अच्छे व्यापारी के तौर पर उनको उम्मीद होती है कि कि इससे उनका मार्केट शेयर बढ़ जाएगा। लेकिन क्या वे व्यापार को पूरी तरह बंद करेंगे और कम लाभदायक धंधे में चले जाएंगे। मुझे संदेह है।

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

खुदरा व्यवसाय देश में निजी क्षेत्र का सबसे बड़ा उद्योग है। यह खेती के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा नियोक्ता क्षेत्र भी है। देश की जीडीपी में लगभग 10 प्रतिशत और रोजगार के अवसर प्रदान करने में 6-7 प्रतिशत हिस्सेदारी खुदरा व्यवसाय की है। लगभग डेढ करोड़ रिटेल आऊटलेट्स के साथ भारत विश्व में सबसे ज्यादा आऊटलेट्स घनत्व वाला देश है। चाहे असंगठित रूप से एक परिवार द्वारा छोटे स्तर पर किया जाने वाले खुदरा व्यवसाय के स्वरूप में हो अथवा संगठित रूप में पिछले दस वर्षों में यह क्षेत्र महत्वपूर्ण विकास का साक्षी बना है। उदारवादी अर्थ व्यवस्था, प्रतिव्यक्ति आय और उपभोक्तावाद में वृद्धि ने बड