School Vouchers

भारत में शिक्षा के लिए संसाधन जुटाने की तमाम कोशिशें हो रही हैं। शिक्षा उपकर से लेकर न जाने क्या-क्या? पर हकीकत ये है कि सरकार जो पैसे खर्च करती हैं, उसका भारी दुरुपयोग होता है। क्यों न शिक्षा के लिए आवंटित पैसे सीधे-सीधे छात्रों को वाउचर के रूप में दे दिया जाए - पेश है इस पर एक पड़ताल।

- शिक्षा का अधिकार कानून ही बन रहा शिक्षा की राह का सबसे बड़ा रोड़ा
- आरटीई के दोषपूर्ण उपनियमों के कारण 1 लाख से अधिक स्कूलों पर तालाबंदी का खतरा, 2 करोड़ से  ज्यादा छात्रों का भविष्य दाव पर

सरकार को सार्वजनिक कार्यों की व्यवस्था करनी चाहिए अथवा वित्तीय सहायता देनी चाहिए, पर वास्तविक प्रबंधन निजी क्षेत्र के लिए ही छोड़ दिया जाना चाहिए। इस विचारधारा के तहत सरकार और निजी क्षेत्र के उद्यमी मिलजुल कर व्यवस्था की गाड़ी को आगे बढ़ाते हैं। सरकार जहाँ दिशा-निर्देशक अथवा मार्गदर्शक की भूमिका निभाती है, वहीं वास्तविक धरातल पर कार्यों को अंजाम देने का कार्य निजी क्षेत्र के उद्यमी करते हैं। इस व्यवस्था में कार्यों की बारीकियों में उलझने की जगह सरकार का ध्यान इस बात पर केंद्रित रहता है कि उसे हासिल क्या करना है। इस तरह वास्तविक प्रबंधन में लगे बिना ही सरकार नागरिकों को निजी क्षेत्र के उद्यमियों द्वारा हर तरह की सेवा दिला सकती है। अगर सरकार छात्रों को पाठयपुस्तक नि:शुल्क देना चाहती है, तो उसे प्रकाशन कार्य में स्वयं लगने की जरूरत नहीं। वह निजी प्रकाशकों से पुस्तक खरीद कर छात्रों को दे सकती है या बेहतर होगा कि छात्रों को पैसे ही दे दिये जाएँ, ताकि वे अपनी जरूरत की किताबें स्वयं खरीद लें।

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सेंटर फॉर सिविल सोसायटी के सहयोग से दिल्ली के प्राइवेट बजट स्कूलों मे चलाये जा रहे "वाउचर कार्यक्रम" पर आधारित, लोकसभा टी.वी. द्वारा तैयार, खास कार्यक्रम "विशेष" का प्रसारण लोकसभा टी.वी. पर रविवार (6 फरवरी 2011)  दोपहर 1 बजे देखना न भूलें।