जंगल

पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों ने प्रकृति और संस्कृति, कला और जीवन, सामरिक ललक, भावनात्मक एवं आध्यात्मिक शांति, जैव एवं सांस्कृतिक विविधता के बीच एक बेमिसाल तालमेल स्थापित किया है और इसे संरक्षित भी किया है। इन लोगों ने इस संतुलन की खूबी को संगीत, कला, स्थापत्य, अपनी सोच और ज्ञान प्रणाली, जीवन के आधारभूत रीति रिवाज से लेकर अपने कार्यों, मौसम और प्रकृति में संजोये रखा है।

- वन कानून में बदलाव के लिए सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई जनहित याचिका

- याचिका में ट्रांजिट पास परमिट व्यवस्था खत्म करने की भी लगाई गई है गुहार

ग्रामीण भारत में जल और जंगल दो सबसे ज्यादा मूल्यवान संसाधन हैं। लेकिन ये संसाधन इन इलाकों में रहने वाले लोगों के हाथ में नहीं हैं। ये राज्य के हाथ में हैं और राज्य ही इनका प्रबंधन करता है। जल और जंगल ग्रामीण समुदायों की बजाए देश की संपत्ति है। ये राष्ट्रीयकृत संसाधन हैं। इस राष्ट्रीयकरण ने ग्रामीणों को उनके बहुमूल्य आर्थिक संसाधन से वंचित कर दिया है। यह एक ऐतिहासिक अन्याय है। 
 

केंद्रीय पर्यावरण और वन  मंत्रालय द्वारा जारी राष्ट्रीय पर्यावरण नीति के मसौदे में प्रदूषक भुगतान करें,लागत न्यूनतम हो,और प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए बाजार पर आधारित प्रोत्साहनों पर बल दिया गया है। इसकी एक तार्किक परिणिती यह होनी चाहिए कि प्राकृतिक संसाधनों की स्वामित्व या प्रबंधन का जिम्मा उन समुदायों को सौंपा जाए जो उन पर निर्भर हैं। लेकिन उस मामले में यह नीति कम पड़ती है।यह कमी बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में ज्यादातर सामूहिक प्राकृतिक संसाधन मुक्त संसाधनों में बदल चुकें हैं।

वाघ बनाम आदिवासी – अनुसूचित जनजाति (वन अधिकार मान्यता) बिल 2005 पर बहस को इसी रूप में पेश किया जा रहा है। आप अगर वाघ के पक्ष में हैं तो आपको आदिवासियों के वन अधिकार को मान्यता नहीं देनी चाहिए। और यदि आप आदिवासियों के पक्ष में हैं तो इसका मतलब यह है कि वाघ आपके लिए महत्वपूर्ण नहीं हैं। यह पूरीतरह से झूठी दुविधा है।

चीनी वस्तुओं के किसी भी बाजार में छाए रहने का मुख्य कारण उनका तुलनात्मक रूप से सस्ता होना होता है। लेकिन यदि देसी वस्तु के सस्ते होने के बावजूद उसी चीनी वस्तु की भारी मात्रा आयात की जाए और यहां के उत्पादकों की अनदेखी की जाए तो इसे नीति निर्धारकों की अदूरदर्शिता  नहीं तो और क्या कहेंगे।

बीते रविवार को हम सब ने धूमधाम से लोहड़ी जलाई। इसी तरह होली के भी पहले लोग होलिका दहन करते हैं। आज के ग्लोबल वॉर्मिंग के दौर में त्योहारों के नाम पर क्या ऐसे रिवाज उचित हैं?

बांस के पेड़ की बजाए घास होने के तथ्य के वैज्ञानिक तौर पर प्रमाणित और संवैधानिक तौर पर स्वीकृत हो जाने के बावजूद नौकरशाही और पहले से जारी व्यवस्था के कारण अब तक इसे घास के रूप वैधानिक मान्यता नहीं मिल सकी है। जिसके कारण इसकी कटाई और व्यवसायिक प्रयोग की मनाही है। यदि इसे घास के रूप में पर्यावरण और वन मंत्रालय से वैधानिक मान्यता मिल जाती है तो देश में न केवल हरे वृक्षों की कटाई में कमी आएगी बल्कि इसके सहारे आजिविका कमाने वाले लाखों आदिवासियों व जंगल पर निर्भर जनजातियों को व्यवसाय भी उपलब्ध हो सकेगा। यहां तक कि स्वयं योजना आयोग का भी मानना है कि इससे 5 करोड़ लोगों के रोजगार