अध्यापक

शिक्षक हूँ, पर ये मत सोचो,
बच्चों को सिखाने बैठा हूँ..
मैं डाक बनाने बैठा हूँ ,
मैं कहाँ पढ़ाने बैठा हूँ।
कक्षा में जाने से पहले
भोजन तैयार कराना है...
ईंधन का इंतजाम करना
फिर सब्जी लेने जाना है।
गेहूँ ,चावल, मिर्ची, धनिया
का हिसाब लगाने बैठा हूँ,
मैं कहाँ पढ़ाने बैठा हूँ ...
कितने एस.सी. कितने बी.सी.
कितने जनरल दाखिले हुए,
कितने आधार बने अब तक
कितनों के खाते खुले हुए
बस यहाँ कागजों में उलझा
निज साख बचाने बैठा हूँ

सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की विद्यार्थियों के प्रति अरुचि और कक्षाओं से नदारद रहने के मामले सामने आते रहते हैं। इस व्यवस्था में बदलाव के लिए जरूरी है कि न सिर्फ मानिटरिंग सिस्टम बेहतर हो बल्कि शिक्षकों को उनके प्रदर्शन पर आधारित प्रोत्साहन दिया जाए। सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी (सीसीएस) की ओर से दिल्ली के सरकारी, निजी व बजट स्कूलों को ध्यान में रखकर हुई रिसर्च में सामने आया है कि किस तरह से सरकारी स्कूलों की हालत खराब हो रही है और निजी स्कूलों की साख मजबूत हो रही है।
 

शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) को लागू हुए आज तीन वर्ष पूरे हो गए। इस मौके पर देश भर में सरकारी व गैर सरकारी स्तर पर बेहतर शिक्षा, स्कूलों व अध्यापकों की गुणवत्ता आदि पर ढेरों बातें हुईं। अधिकांश चर्चाओं परिचर्चाओं का मुख्य केंद्र सरकार द्वारा इस मद में खर्च की जाने वाली धनराशि, सरकारी स्कूलों की खराब स्थिति व स्कूलों में पिछले तीन वर्षों के दौरान हुए दाखिलों की बातें ही रहीं। छात्रों को किस प्रकार के कमरों में पढ़ाया जाए? स्कूल का आकार कम से कम कितने क्षेत्र में फैला होना चाहिए? कक्षा में अधिकतम छात्र कितने होने चाहिए? मिड डे मिल का मेन्यू क्या हो ताकि छात

आज के समय में नागरिक अधिकारों के लड़ाई की दृष्टि से शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण युद्ध का मैदान बन गया है। और इसप्रकार, गरीबी के खिलाफ सबसे महत्वपूर्ण संघर्षों में से एक स्कूलों में लड़ा जाने लगा है।

शहरी स्कूलों में आज 1950 के शुरुआती वर्षों जैसी ‘अलग लेकिन समान’ प्रणाली की मांग गूंजने लगी है। शिकागो पब्लिक स्कूल, जहां अध्यापक इन दिनों हड़ताल पर हैं, में पढ़ने वाले 86 प्रतिशत बच्चे अश्वेत या हिस्पैनिक हैं और 87 प्रतिशत बच्चे निम्न आय वाले परिवारों से आते हैं।