छात्र

बहुत पुरानी बात है। गंगा तट पर बसी काशी नगरी को तब भी व्यापार, कला और कारीगरी के क्षेत्र में उत्कृष्ट मुकाम हासिल था। नगर से थोड़ी दूरी पर जुलाहों का एक दल निवास करता था। जुलाहों का मुख्य पेशा बांस की टोकरी आदि बनाना था। आमतौर पर उनके मकान कच्चे थे और बांस, मिट्टी और खपरैल आदि के ही बने थे। उनमें से सिर्फ दो-एक मकान ऐसे थे जो पक्के थे। इन पक्के मकानों में से एक मकान वृद्ध रामदीन का था। दरअसल, रामदीन अन्य जुलाहों की तरह बांस की टोकरी इत्यादि बनाने के स्थान पर रेशम के वस्त्र बनाया करता था। उसके बनाए हुए वस्त्रों की एक अलग खासियत थी। वस्त्र सदैव

- गुजरात मॉडल में स्कूल भवन, खेल के मैदान आदि की अनिवार्यता की बजाय छात्रों के प्रदर्शन को बनाया गया है मान्यता प्रदान करने का आधार

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जब ऐसा कहा गया है कि मानव (Home Economicus) धन पैदा करने के लिए तैयार किया गया एक यंत्र है, तो भारतीय अर्थशास्त्र में बताए जा रहे उस तर्क की जांच करना अत्यंत आवश्यक हो जाता है, जिसके अनुसार भारत की विशाल जनसंख्या गरीबी का एक कारण है। यदि मनुष्य एक मात्र ऐसी प्रजाति है जो धन पैदा कर सकती है, तो इसकी अधिक संख्या गरीबी का कारण कैसे हो सकती है? सच क्या है ?

आज के समय में नागरिक अधिकारों के लड़ाई की दृष्टि से शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण युद्ध का मैदान बन गया है। और इसप्रकार, गरीबी के खिलाफ सबसे महत्वपूर्ण संघर्षों में से एक स्कूलों में लड़ा जाने लगा है।

शहरी स्कूलों में आज 1950 के शुरुआती वर्षों जैसी ‘अलग लेकिन समान’ प्रणाली की मांग गूंजने लगी है। शिकागो पब्लिक स्कूल, जहां अध्यापक इन दिनों हड़ताल पर हैं, में पढ़ने वाले 86 प्रतिशत बच्चे अश्वेत या हिस्पैनिक हैं और 87 प्रतिशत बच्चे निम्न आय वाले परिवारों से आते हैं।

इस सवाल का जो लगभग अनबूझ जवाब मैंने दिया है उसका महत्व समझने में कुछ पल का वक्त लगेगा, मैं यह कह रहा हूं कि स्कूलों के बीच प्रतिस्पर्धा संबंधित स्कूलों, परिवारों और कुल मिलाकर समाज के लिए या तो अच्छी हो सकती है या फिर बुरी। यह सब परिस्थितियों पर निर्भर है, जिसमें कानून