पूर्वोत्तर

पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों ने प्रकृति और संस्कृति, कला और जीवन, सामरिक ललक, भावनात्मक एवं आध्यात्मिक शांति, जैव एवं सांस्कृतिक विविधता के बीच एक बेमिसाल तालमेल स्थापित किया है और इसे संरक्षित भी किया है। इन लोगों ने इस संतुलन की खूबी को संगीत, कला, स्थापत्य, अपनी सोच और ज्ञान प्रणाली, जीवन के आधारभूत रीति रिवाज से लेकर अपने कार्यों, मौसम और प्रकृति में संजोये रखा है।

बारिश आई नहीं कि हमारे शहरों के बखिए उधडऩे लगते हैं। ताशमहल की तरह ढहते पुराने या निर्माणाधीन (अक्सर अवैध) नए मकान, बदहाल सड़कें, जलभराव से अदृश्य बने फुटपाथ, वाहन चालकों के दु:स्वप्न बने सड़कों पर बिछे जर्जर जड़ों वाले उखड़े पेड़, ट्रैफिक जाम और बिना ढक्कन वाले मेनहोलों से भलभलाकर सड़क पर उफनाते शहरी नाले; यह आज मानसूनी महीनों के दौरान देश के तकरीबन हर बड़े शहर का नजारा है। फिर गर्मी आई तो बिजली, पानी की कमी और बीमारियों का प्रकोप चालू हुआ। जब-जब इस बदहाली के दोष का विभिन्न राजनेताओं के बीच बंटवारा होने लगता है, तब-तब कहा जाने लगता है कि हमारा दोष नहीं, अमुक ने